Poems

भोजपुरी गीत कटार तोरे नैना

भोजपुरी गीत(श्रिंगार रस )- बरछी कटार तोहार नैना |

बरछी कटार तोहार नैना दिल के पार हो जाई |
ओ ओ सजनी हमार होस उड़ा जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई |
होठवा से छलके तोहार मदवा के प्याला |
हिरनी जईसन कारे नैना बाड़े मतवाला |
गोरे गोड़वा के पायलिया जब छनका जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई |
मिटावा मिटावा पियासिया के लगन की |
रात दीन सतावे गंधवा तोहरे बदन की |
नींदिया भोराई हाथ तोहरे जब सेज सजी जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई |
हम रहली कुंआर और तू कुंआरी
अबले रहल मन हमरो बाल ब्र्म्हचारी |
हमरो तपस्या बरिस के छन मे लूटी जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई | -2
बरछी कटार तोहार नैना दिल के पार हो जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई |
सुना हो सजनी हमार होस उड़ा जाई |-2

श्याम कुँवर भारती [राजभर] कवि ,लेखक ,गीतकार ,समाजसेवी ,
मोब /वाहत्सप्प्स -995550928
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करवा चौथ

आज बहुत सुन्दर लग रही हो तुम
इस चाँद से चेहरे पर कुछ कहना चहुँ तो
पहले ही शर्मा कर हाथो से
चेहरे को ढक लेती हो तुम.

मुझे देखकर जो तेरे चेहरे की
लालिमा बढ़ती जाती है
देख- देख तुझे मेरे दिल की कलि
खिलती जाती है.

सबको रात का इंतजार है
देखने चमकते चाँद को दिल बेक़रार है
इतना सुन्दर श्रृंगार किया है
दिल तो लूटने को भी तैयार है.

आज सुनती सभी महिलाये
करवा चौथ की कहानी
सुनो प्रिया, श्रृंगार सहित श्रृंगार रहित
तुम ही सदा रहोगी मेरे दिल की रानी.

Ati haiTeri yad

आती है बहुत ही याद तेरी,
तेरे जाने के बाद तेरी,
कब तक तुम आओगे यहा,
यह खबर नहीं है तेरी,
महफिल है सजी यहां,
बस तुम ही नहीं हो यहा,
घर आ जाओ तुम तो,
रौनके बहार आ जाएंगी यहां,
सज जाएगी महफिल मेरी,
एक तू ही तो हो मंजिल मेरी |

करवा-चौथ विषेश

ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं।
मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं।

बैठी पलकें बिछाए,
तेरा दीदार हो जाए,
तेरे इंतज़ार की घड़ी बढ़ाना नहीं।
ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं।
मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं।

बगैर आबो-दाना,
मुश्किल दिन बिताना,
मकसद मेरा, तुझे बताना नहीं।
ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं।
मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं।

मेरी लंबी उम्र का जिक्र है,
मुझे मेरे चाँद की फिक्र है,
मंज़ूर मुझे बादलों का बहाना नहीं।
ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं।
मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं।

देवेश साखरे ‘देव’

आबो-दाना – अन्न और जल

चाँद

चाँद

आखिर कौन किसको देखने छत पर आया करता है,
चाँद इस ज़मीं पे या उस आसमान पे छाया करता है,

इंतज़ार कौन और किसका बड़ी बेसबरी से करता है,
पहले अंधेरा या रौशनी कौन किसको पाया करता है,

उम्र किसकी और कितनी बढ़ाने की चाहत में पागल,
है कौन जो रात दिन यूँहीं पलकें झपकाया करता है।।

राही अंजाना

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