मेरी उठती सांसों की तरह वो दबे- दबे से एहसास कैसे उठते चले गए वज़ूद को भेदने लगी तेरी लफ़्ज़ों की सौगाते कैसे सुनते चले गए तेरे हँसने से झर रहे फूल चाहा था चुनना […]

तुमने मेरे बाग़ के फूलों को पत्थर कर दिया, मैं तेरी गली के पत्थरों को फूल करके आया हूँ जाना मुझे तेरी गली ,आना तुझे मेरे बाग़ों में इस आने जाने को कितना माकूल करके […]

वादियों में गूंजती आवाज़ लौट सकती है घटाओं में छुपी बिजलियाँ कौंध सकती है ना ले मेरी खामोशियों का इम्तेहान इस कदर, मेरी ख़ामोशी तेरे लफ़्ज़ों को रौंद सकती है राजेश’अरमान’

अब गुनाह में नीयत नहीं देखी जाती अब प्यार में सीरत नहीं देखी जाती सब के अपने फलसफे ,सबके अपने तजुर्बे अब उम्र के लिहाज़ की इज्जत नहीं देखी जाती धन दौलत का चारों तरफ […]

कोई शजर शाख से बैर नहीं रखती कोई शाख पत्तों को गैर नहीं रखती अपने हौसलों से ही जहाँ मिलता है कोई दरवाज़े पे किस्मत पैर नहीं रखती राजेश’अरमान’

मसला सिर्फ इतना है वो समझते नहीं मुझे गर समझते तो इक नया मसला खड़ा होता ठीक से नहीं समझते इस ठीक से समझने की कोई परिभाषा नहीं है अंदर से तालमेल की कोई अभिलाषा […]

बारिश की बूंदो की हल्की हल्की आवाज़ कानो में रस घोलते जेहन में उतर जाती है कौंधती बिजलियाँ कुछ ठक ठक सी दस्तक देती है मन के कोने में जिस कोने को बंद दरवाज़ा बना […]

गुथियाँ सुलझाने में उलझ जाता जीवन पकड़ के कान खींचता है जीवन कभी इस तरफ कभी उस तरफ सीधी रेखाएं खींचता हूँ जीवन की, पर जा के मिल जाती है ये हाथ की टेढी रेखाओं […]

एक जानी पहचानी सड़क पर चला जा था मैं बेखबर तभी कुछ पहचानी सी आवाज़ें सुनाई दी पुलिस की गाडी की आवाज़ सुनाई दी देखा सड़क पर पड़ी हुई थी एक लाश जिसके कातिल को […]

खुद से जुदा भी नहीं मुखातिब भी नहीं खुद को बयां करूँ ऐसा कातिब भी नहीं गुमगश्ता फिरती है नाशाद रूह जिसकी फ़िदाई बन भी सकूँ ऐसा जाज़िब भी नहीं राजेश’अरमान’ फ़िदाई= प्रेमी कातिब= लेखक […]

तेरी याद आज बैठी है गुमसुम शायद थक गई यादों की भी उम्र होती है एक उम्र बाद यादें धुँधली पड़ जाती है लेकिन तुम्हारी यादों की ताप बढ़ गई है उम्र के साथ राजेश’अरमान’

कुछ खट्टी मीठी छोटी छोटी बातों का एक छोटा सा संसार है जिसे न जाने कितनी सरहदों कितने धर्मों में बाँट रखा है बस आती जाती सोच का तमाशा है जरूरी है तय होना कौन […]

दुनिया में रहकर दुनिया को तकता हूँ आईने को किसी दुश्मन सा तकता हूँ बेनूर से मंजर का हक़ लिए फिरता हूँ , आँखों से बस ढहते ख्वाबों को तकता हूँ राजेश’अरमान’

कुछ खत रेत पे लिखे , मैंने तेरे लिए फिर हवाओं को सदा दी, मैंने तेरे लिए अपने हिस्से की बूंदे तोगिरा दी मैंने कुछ आँखों में छुपा दी ,मैंने तेरे लिए तेरे खत को […]

नज़राना क्या दूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का हक़ अदा कैसे करूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का कहने को अल्फ़ाज़ कुछ इस तरह है मौजूँ न छूटे कभी साथ ,दोस्त तेरी दोस्ती का राजेश’अरमान’