मेरी उठती सांसों की तरह वो दबे- दबे से एहसास कैसे उठते चले गए वज़ूद को भेदने लगी तेरी लफ़्ज़ों की सौगाते कैसे सुनते चले गए तेरे हँसने से झर रहे फूल चाहा था चुनना […]
मेरी उठती सांसों की तरह वो दबे- दबे से एहसास कैसे उठते चले गए वज़ूद को भेदने लगी तेरी लफ़्ज़ों की सौगाते कैसे सुनते चले गए तेरे हँसने से झर रहे फूल चाहा था चुनना […]
तूफां ने लहरों को कब ज़िंदगी दी है हवाओं ने चरागों को कब रौशनी दी है चाँद को तकता है थोड़ी सी रौशनी के लिए , सूरज ने कब जुगनुओं को रौशनी दी है राजेश’अरमान […]
तुमने मेरे बाग़ के फूलों को पत्थर कर दिया, मैं तेरी गली के पत्थरों को फूल करके आया हूँ जाना मुझे तेरी गली ,आना तुझे मेरे बाग़ों में इस आने जाने को कितना माकूल करके […]
वादियों में गूंजती आवाज़ लौट सकती है घटाओं में छुपी बिजलियाँ कौंध सकती है ना ले मेरी खामोशियों का इम्तेहान इस कदर, मेरी ख़ामोशी तेरे लफ़्ज़ों को रौंद सकती है राजेश’अरमान’
तुम आसमाँ मैं ज़मीं ही सही तुम हो आंसूं मैं नमीं ही सही यूँ पलट के देखना तेरा बार बार कुछ नहीं मेरी कमीं ही सही राजेश’अरमान ‘
शोर नहीं जो दबा दिया जाऊँ हर्फ़ नहीं जो मिटा दिया जाऊँ कोई दीवार पे टंगी तस्वीर नहीं जब चाहे जिसे हटा दिया जाऊँ राजेश’अरमान’
जो बिकता सरे आम वो ईमान होता है जो जहाँ को समझे वो नादान होता है बदलते रंग में ढल गयी सारी दुनिया जो अधूरा रहे सदा वो ‘अरमान’ होता है राजेश’अरमान’
आ ज़िंदगी तुझे रिश्वत दूँ एक नई तुझे तबियत दूँ गुफ्तगू ये तेरे मेरे बीच की , आ नई तुझे शख्शियत दूँ राजेश’अरमान’
मैं रास्ते खुद अपने बना लूँगा वक़्त जैसे चलना है अपनी चाल चल राजेश’अरमान’
अब गुनाह में नीयत नहीं देखी जाती अब प्यार में सीरत नहीं देखी जाती सब के अपने फलसफे ,सबके अपने तजुर्बे अब उम्र के लिहाज़ की इज्जत नहीं देखी जाती धन दौलत का चारों तरफ […]
जुदा हो जाते पिंजरे से पखेरू लिख जाते कोई दास्तां अधूरी राजेश’अरमान’
कोई शजर शाख से बैर नहीं रखती कोई शाख पत्तों को गैर नहीं रखती अपने हौसलों से ही जहाँ मिलता है कोई दरवाज़े पे किस्मत पैर नहीं रखती राजेश’अरमान’
इतना न पशेमाँ हो की मैं पिघल जाऊं कुछ तो रहने दो पत्थर मेरे अंदर राजेश’अरमान’
दे के वो गिनते रहे ज़ख्म मेरे मैं उनकी सादगी पे फ़िदा हो गया राजेश’अरमान’
या रब्ब दुश्मनों को सलामत रखे सदा न जाने कब आरज़ू क़त्ल की मचल जाये राजेश’अरमान’
अंधेरों में वो नज़र आते है उजालों में जो ठहर जाते है चाक रखते है दामन अपना पर महफ़िलों में संवर जाते है राजेश’अरमान’
अक्स आईने में दिखता तो जरूर है हम ही तोहमत लगा जाते है आईने पे राजेश’अरमान’
मसला सिर्फ इतना है वो समझते नहीं मुझे गर समझते तो इक नया मसला खड़ा होता ठीक से नहीं समझते इस ठीक से समझने की कोई परिभाषा नहीं है अंदर से तालमेल की कोई अभिलाषा […]
बारिश की बूंदो की हल्की हल्की आवाज़ कानो में रस घोलते जेहन में उतर जाती है कौंधती बिजलियाँ कुछ ठक ठक सी दस्तक देती है मन के कोने में जिस कोने को बंद दरवाज़ा बना […]
गुथियाँ सुलझाने में उलझ जाता जीवन पकड़ के कान खींचता है जीवन कभी इस तरफ कभी उस तरफ सीधी रेखाएं खींचता हूँ जीवन की, पर जा के मिल जाती है ये हाथ की टेढी रेखाओं […]
एक जानी पहचानी सड़क पर चला जा था मैं बेखबर तभी कुछ पहचानी सी आवाज़ें सुनाई दी पुलिस की गाडी की आवाज़ सुनाई दी देखा सड़क पर पड़ी हुई थी एक लाश जिसके कातिल को […]
खुद से जुदा भी नहीं मुखातिब भी नहीं खुद को बयां करूँ ऐसा कातिब भी नहीं गुमगश्ता फिरती है नाशाद रूह जिसकी फ़िदाई बन भी सकूँ ऐसा जाज़िब भी नहीं राजेश’अरमान’ फ़िदाई= प्रेमी कातिब= लेखक […]
तेरी याद आज बैठी है गुमसुम शायद थक गई यादों की भी उम्र होती है एक उम्र बाद यादें धुँधली पड़ जाती है लेकिन तुम्हारी यादों की ताप बढ़ गई है उम्र के साथ राजेश’अरमान’
कुछ खट्टी मीठी छोटी छोटी बातों का एक छोटा सा संसार है जिसे न जाने कितनी सरहदों कितने धर्मों में बाँट रखा है बस आती जाती सोच का तमाशा है जरूरी है तय होना कौन […]
सहमी सी शाम रातों के घने साये काँपती सुबह दिन वही अजनबी लोग कहते है की अब ज़माना बदल गया है राजेश’अरमान’
सजदा करते उम्र गुजर गई मुँह फेरकर दुआ गुजर गई ज़िंदगी इसी कश्मकश में गुजरी , मेरी बंदगी बेवफा बन गुजर गई राजेश’अरमान’
मसखरी भी करती है ज़िंदगी तब जाना जब खुद को खुद पे हँसता हुआ पाया राजेश’अरमान’
दुनिया में रहकर दुनिया को तकता हूँ आईने को किसी दुश्मन सा तकता हूँ बेनूर से मंजर का हक़ लिए फिरता हूँ , आँखों से बस ढहते ख्वाबों को तकता हूँ राजेश’अरमान’
कुछ खत रेत पे लिखे , मैंने तेरे लिए फिर हवाओं को सदा दी, मैंने तेरे लिए अपने हिस्से की बूंदे तोगिरा दी मैंने कुछ आँखों में छुपा दी ,मैंने तेरे लिए तेरे खत को […]
नज़राना क्या दूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का हक़ अदा कैसे करूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का कहने को अल्फ़ाज़ कुछ इस तरह है मौजूँ न छूटे कभी साथ ,दोस्त तेरी दोस्ती का राजेश’अरमान’
कितने पास आ गए है उजालों में छिपे अँधेरे कभी खुद को कभी अपनी परछाई को देखता हूँ राजेश’अरमान’
अपने नहीं औरों के कन्धों पे नज़र रहती है बोझ कभी न कभी जिन्हे मेरा उठाना है राजेश ‘अरमान’
रिश्तें आसमा में उड़ती पतंग की तरह है जिसे लूटने के लिए दुनिया खड़ी है राजेश’अरमान’
वो इतना घबरा गए है वफ़ा के नाम पर बेवफाई के नमूनो की तस्वीर सजा रहे है राजेश’अरमान’
तज़ुर्बे जलने के बटोरे उम्र भर जानता हूँ बेकार नहीं जायेगा राजेश’अरमान’
वो झूठ भी बोलते है इस सफाई से सच भी उनके सामने झूठ बन जाता है राजेश’अरमान’
कुछ गुजरने जैसी ही गुजर जाती है किसी तमगे की मोहताज नहीं होती ज़िंदगी राजेश’अरमान’
उनके फेके पत्थर अब तक उठा रहा हूँ न जाने फिर कब उनके काम आ जाएँ राजेश’अरमान’
मेरी तस्वीर से लेकर तक़दीर सब गर तय है मेरे हिस्सें में पाप -पुण्य का खाता क्यूँ ? राजेश’अरमान’
हाथ की लकीरें ही गर सुख-दुःख है जीवन फिर खेल कहाँ ,बस इक तमाशा है राजेश’अरमान’
गर मैं तुम्हे फिर पाने के लिए यहाँ हूँ ऐ खुदा फिर जुदा होने की ये सजा कैसी राजेश’अरमान’
गर खुदा होना ही मंज़िल है हाथों में गलत नक़्शा क्यों ? राजेश’अरमान’
अपने कण कण को बस तराश रहा हूँ तेरे जर्रें -जर्रें को बस तलाश रहा हूँ राजेश’अरमान’
हर आती साँस जाती साँस का अक्स है, और हर जाती साँस आती साँस का आईना राजेश’अरमान’
सब डोर है तेरे हाथों में अपने हाथों में चंद लकीरें राजेश’अरमान’
गर बंद आँखों से ही तेरा दीदार हो ख़ुदा ऑंखें खुलने की सजा न दे राजेश’अरमान’
हर रास्तों पे हमसफ़र जरूरी नहीं मंज़िलें जुदा हो तो मंज़िल नहीं मिलती राजेश’अरमान’
लकीरें जुदा कर सकती है हसरतें मिटा नहीं सकती राजेश’अरमान’
अपने कल्ब की आवाज़ भी न सुन सका शोर ज़माने का बाहर इस कदर था राजेश’अरमान’
टूटी शाख के पत्ते ,शाख के गुनाह होते है सजा बेगुनाहों को भी मिलती है इस तरह राजेश’अरमान’
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