उनके चेहरे से नज़र है कि हटती नहीं,
वो जो मिल जाए अगर, चहकती कहीं।
वो जो हँसी जब, नज़रें मेरी बहकने लगीं,
मन की मोम जाने आज क्यों पिघलती गई।
भूली-बिसरी निगाहें जो उनसे टकरा गईं,
वो बारिश बनकर मुझ पर बरसती गई।
सदियों से बंद किए बैठे थे इस दिल को,
मगर चुपके से वो इस दिल में उतरती गई।
आँखों का नूर1 करता मजबूर निगाहों को,
दिल के आईने में उनकी तस्वीर बनती गई।
हो गई क़यामत 2 वो सामने जो आ गए,
दर्द-ए-दिल से आज ग़ज़ल निकलती गई।
1. प्रकाश; 2. प्रलय।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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