Yaad hai ya fir bhul gye the

याद है या फिर भूल गए। वो छोटी छोटी नज़्मे मेरी शाम के वो आवरा बादल मौजों मे फिरते थे पागल शब्ज़ों का एक बाग वहाँ था पता नहीं अब किधर गया था पहुँच गया अपने ही भीतर खुद में ही हम भटक गये थे

याद है या फिर भूल गए। वो अपनी कहानी अपने किस्से टूटा दिल जख्मों के हिस्से यादों के काराज़ के टुकड़े चलते थे उंगली को पकड़े गिरी हुई मेरी नज़्मो को हाथों से तुम सहलाते थे याद है या फिर भूल गए।”

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