अनकही सी एक बात

बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या,

कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है
और खरीद लूँ वो खिलौने
जिसमें लाखों कि खुशी रहती है
खरीदना है मुझे आँचल वो माँ का
जिसके पहलू में कभी धूप नही लगती
कहाँ पाऊँ मैं जिगर बाप का
जिसके साये में कभी भूख न बिलखती
ऐसी कश्ती से मेरा सामना हर बार हो गया है
कितनी तेजी से ये शहर भी बाज़ार हो गया है

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Hi, I am Vikas Bhanti. A Civil Engineer by proffession by poet by heart. Kindly like my page on FB and subscribe my YouTube channel for updates

8 Comments

  1. Panna - November 12, 2015, 2:24 pm

    अद्भुत काव्य रचना|

  2. Ajay Nawal - November 12, 2015, 3:56 pm

    Nice poem

  3. Anjali Gupta - November 12, 2015, 5:54 pm

    beautiful poem 🙂

  4. Kapil Singh - November 12, 2015, 7:57 pm

    इक अनकहे सच को बयां करती है आपकी कवित.. लाजबाव

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