आदि शक्ति

रोज हजारों अफसाने गढ़े जाते
तुम्हारे रोने पर… खिलखिलाने पर…
नगमे लिखे जाते,
तुम्हारे फूल से होंठों के ….मुस्कुराने पर।
तुम्हारे मिलन पर,
बिछोह पर,
प्रेम पर ,
बेचारगी पर….।

हर पल हर कदम
हजारों आंखें पड़ी हैं पीछे ,
तुम्हारी हर अगली उड़ान पर।
पूरी की पूरी सृष्टि को है तुमसे सरोकार।

तुम हो पूरी सृष्टि के लिए
एक चलता फिरता
मसालेदार अखबार।

हर पल हर घटना ….
लगता है तुम्ही से जुड़ी हैं।

तभी तो पूरी दुनिया
पंक्ति बंद होकर
तुम्हारे ही पीछे खड़ी है।

तुम्हें समझती
हर सच्ची झूठी घटना की कड़ी है।

तुम हो नाजुक से फूल की पंखुड़ी,
जिसे पाने को
भेड़ चाल बड़ी है।

तुम्हारी ही वजह से इतिहास में
हजारों तलवारी खिची है।

तुमने लड़ी भी लड़ाईया …
छोटी भी कुछ बड़ी है।

फूलों की तरह तुम भी ,
फफूंदो और कीड़ों से जा भिड़ी हो।

वर्चस्व की लड़ाई
अस्तित्व से अड़ी है।

धरती के कोने कोने में
विजय श्री ही मिली है।

आखिर क्या हो तुम?
आदि भवानी या कोमल कमलानी?

मैं बताऊं!
इस संसार के हर पुतले की माटी…

जिसकी बिना ..
अस्तित्व रहित है
यह पूरा भरा पूरा संसार …
ये सुंदर घाटी।

हां !
तुम स्त्री हो।
जननी हो।
सशक्त महिला हो।
तुम इस सृष्टि का आधार हो।

फिर तुम्हारा जन्म
कुछ बुद्धिहीन
निकृष्ट क्यों मानते हैं?

क्योंकि बल केआगे बुद्धि
भाग ही जाती है..

और फिर आदिशक्ति को निरर्थक समझकर
यह दुनिया यूं ही सताती है।

निमिषा सिंघल

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