आहुति

आहुति
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अम्मा!
तुमसे कहनी एक बात..
कैसे चलीं तुम?
बाबूजी से दो कदम पीछे…
या चलीं
साथ।

कैसे रख पाती थीं तुम बाबूजी को हाथों ही हाथ?
जब मनवानी होती थी तुम्हें कोई बात..
क्या करती थी जिद!
या करती थीं प्यार से बात।

हृदय छलनी होने पर
छुपा लेती थी छालें?
या बड़बडा़कर खुद से
कर लेती थी गुस्से की आग ठंँडी…..
या लड़ झगड़ कर
खोल देती थीं
मन के जंग खाए ताले।

अच्छा सुनो!
जब नहीं मन चाहता था
घर के काम को तुम्हारा,

तब!
क्या छोड़ देती थी तुम काम सारा!
या बेमन से निपटा देती थी..
चढ़ा मन का पारा।

अच्छा बताओ!
चूल्हे में रोटियांँ सेकतीं
कुछ विचारों में डूब कर..

जब जल जाती थी तुम्हारी उंँगलियां..

तब छलक पड़े आंँसुओं को पल्लू से पौंछ कर,
खुद को डांँट कर …
फिर से काम में लग जाती थी क्या?
या हाय -हाय करके घर सर पर उठा लेती थीं..।

चूल्हे पर दूध निकल जाने पर
खुद को कोसती थी?
या खुद को तैयार करती थी कि अब “लापरवाही की हद है” का तमगा मिलने ही वाला है।

सच बताना अम्मा!
जब अपने सपनों के पंँख
नुचे हुए पाती थीं..
तो क्या नियति मानकर
चुप बैठ जाती थी?
या भाग्य रेखा को कोसती थीं?

अच्छा बताओ!
जब सपने सोने नहीं देते थे
तब क्या तुम उन्हें पूरा करने का ताना-बाना बुनती थी?

जैसे बुना करती थी सलाइयों मैं ऊन डाल नए नए स्वेटर।

अच्छा एक बात और बताना!
सिलाई मशीन पर हमारे छोटे छोटे कपड़े सिलते- सिलते…
क्या नहीं लेते थे जन्म..
नवजात सपने?
नन्हें कोंपल के समान..
अपने शौक को आगे बढ़ाने के।

क्या तुम खुद से ही नहीं लड़ती रहीं?
अपनी आत्मा से ही गुत्थम-गुत्था नही करती रहीं?

या तुमने समझा बुझा लिया था खुद को….
ढाल दिए थे अपने सपने ..
हम बच्चों में..

या तराश दिया था हमें अपने सपनों के खांँचे में..

और दे दी थी आहुति… अपनी इच्छाओं की ….
हृदय के हवन कुंड में…
स्वाहा… की ध्वनि के साथ।

निमिषा सिंघल( स्वरचित मौलिक रचना)

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