कविता

चलो चले …
किसी नदी के किनारे
किसी झरने के नीचें |
जहाँ तुम कल कल बहना
झर झर गिरना और…
और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की
लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर
लिखता जाऊँगा |
चलो चले…
किसी उपवन में
या कानन में !
वहाँ तुम कोयल से
राग मेल करना या
पपीहे के संयम को टटोलना
और मैं उन संवेदनाओं की लडी
अपनी कविता रूपी माला में
पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा |
चलो चले…
सागर के तट पर
तुम उसकी लहरों के साथ
अठखेलिया करना |
और मैं उसके किनारों के
संस्कारों का वर्णन करता रहुंगा !
उसमें दिखने वाले पीले
चमकीले मोतियों को
समेटते समेटते स्वयं ही
लहरों में डूबता उतराता रहुंगा !
चलो चले…
किसी के दर्द में आह् में
किसी कटीले पथ में राह में |
तुम किसी पीडा की आँखे पोछना
मैं उन आसूओं के उद्गम की वेदना
को अपने श्वासों का सुर देता रहुंगा !
चलो चले…
किसी वियोगिनी के वियोग में
उसकी तपश्या के प्रासाद में
उठने वाली कुहुकों को टीसों को
अपने अंत:करण से सूनने |
तुम कुछ उदास होना और
मैं चित्कारे मार मार कर रो लुंगा !
चलो चले…
किसी रणभूमि में
जहाँ दु:शासन दुर्योधन हो
श्री कृष्ण और सुयोधन हो |
मैं भी तलवार उठा लुंगा
तुम नाचना रणचण्डी बनकर
मैं अर्जून कुछ क्षंण बन जाऊँगा !
तब कविता पूरी हो जायेगी
मैं दुष्ट दलन कहलाऊँगा !!
फिर कुम्हलाये देख कपोलों को
दुति दामिनी तुम्हे पुकारुंगा !
तुम सूनती रहना मुझे सदा
और मैं तुझको ही गा लुंगा !!
उपाध्याय…

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