” किस्सा–कुर्सी — का “

व्यंग्य गीत ———– अनुपम त्रिपाठी
” किस्सा–कुर्सी — का ”
बचपन में किस्सों में कुर्सियों की बातें सुनते थे।आजकल कुर्सियों के किस्से आम हैं । लेकिन ये कुर्सियाँ मिलती कैसे हैं ?
इस लोकतंत्र की महती विडम्बना भी यही है कि ; कुर्सी सेवा पर हावी है।
बेशक ; लोकतंत्र जीवित है ——– जीवन्त नहीं बना पाए हम इसे ।
क्या अपने वर्तमान — अपने इतिहास से सीखा है;हमने कुछ!!!
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ये कुरसी का खेल रे भैया ; ये कुरसी का खेल है |
राजनीति में आज शराफत ; बुरीतरह से फेल है ||
अर्थव्यवस्था गिरवी हो गई ; विश्व-बैंक के हाथों में ।
बजट तोडता दम ये हमारा ; कर्ज के भारी खातों में ।।
भूख–गरीबी–बेकारी या ; रोटी–कपड़ा और मकान।
सिमट के सारी तकलीफें भी ; रह गई कोरी बातों में ।।
मज़हब : वोट बैंक बन गया ; धर्म बना : सत्ता की सीढी।
पिछला कितना भोगा हमने ; भोगेगी अब अगली पीढ़ी ।।
सबसे सस्ता खून हो गया ; बिकता मंहगा तेल रे भैया।
————————– ये कुर्सी का खेल है भैया ।।1।।
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“दल–दल”में दल मिलते जाते ; नया मोर्चा रोज बनाते।
जनता का दिल धडका करता ; सेन्सेक्स के आते – जाते।।
संविधान का चीर –हरण अब ; संसद में भी आम हो गया।
नैतिकता और जनसेवा का ; नारा ही बदनाम हो गया।।
घडियालों से पटा पडा है ; लोकतंत्र का महासमन्दर।
अपना ही सिर मूंड रहे हैं ; “गाँधी—- टोपी वाले बंदर” ।।
जेब में दम हो– तुम भी खरीदो ;चुने हुओं की सेल रे भैया।
—————————- ये कुर्सी का खेल रे भैया ।।2।।
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जब हों इलेक्शन—-भूल के फ्रेक्शन ; सारे एक हो जाते हैं।
अल्पसंख्यक और दलित नाम पर ; सारे नेक बन जाते हैं।।
हिन्दू–मुस्लिम—सिख–ईसाई ; कहता कौन हैं : भाई-भाई।
अलग–अलग कानून सभी के ; जुदा—जुदा है : रहनुमाई।।
वोट का सारा गणित इन्हीं से ; ताश के बाबन — पत्ते हैं ।
वक्त — जरुरत ट्रम्प — कार्ड ये ; बाद में सारे छक्के हैं ।।
पाँच साल तक सोते रहते ; फिर मचती रेलम-पेल है भैया।
—————————– ये कुर्सी का खेल रे भैया ।l3ll
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ज्यों–ज्यों मंहगी हुई है खादी ; नेताओं के मूल्य गिरे हैं ।
नैतिकता के ताने—–बाने ; नेतृत्व के कारण बिखरे हैं ।।
मूल्यवृध्दि में पिसकर अब ; जनता ये सिर धुनती है ।
धूँ….धूँ करके देश जल रहा ; ” दिल्ली ॐचा सुनती है “।।
अरे ! जागो—-जागो भारतवालों ; देश तुम्हारी थाती है।
” सिंहासन खाली करो …… कि ; जनता आती है ” ।।
मेरा देश महान है , क्योंकि ; लोकतांत्रिक जेल है भैया।
————————- ये कुर्सी का खेल है भैया ।।4।।
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संविधान की सब धारायें ; सुविधा के आधार पर चलतीं।
नेताओं की निष्ठायें भी ; मौका देख के रंग बदलतीं ।
दो दूनी वे पांच हो गए ; पत्थर थे : अब काँच हो गए ।
इतना झूठ पका हांडी में ; नेता सारे : आँच हो गए ।।
देशप्रेम अब हवा हो गया ; सुन बापू ! ये क्या हो गया ?
फिर से तिरंगा बीच सडक पर;जाने न्याय कहां खो गया।।
मरजी पे मतदान कराते ; इनकी कहां नकेल रे भैया ..।।
————————— ये कुरसी का खेल रे भैया ।।5।।
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(अपने जन्मस्थान की वीरांगना रानी झांसी को और उनके माध्यम से समस्त स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को श्रृध्दासुमन सहित ] **************
आजादी की अमर—- कहानी ; जाने कितनी बार पढी ।
फिर भी याद नहीं ये हमको ; कहां की ” रानी खूब लडी” ।।
कौव्वे सारे शिखर पे बैठे ; भटक रही कोयल वन–वन में ।
सुलग रही है — आग मगर ये ; हौले — हौले जनगण में ।।
अब विश्वास करें हम किसपर? और किसे हम अपना मानें ??
हर चुनाव में दुविधा भारी ; अंधे चुनें …… या चुन लें काने।।
जहाँ हो मरजी — चेन खींच लो ; देश ये जनता–रेल है भैया।
अब बदलाब जरुरी “अनुपम” ; बासी हो गई भेल रे भैया ।।
——————————ये कुरसी का खेल रे भैया ।।6।।
……………….. ये कुरसी का खेल है……… ………………………..
‪#‎anupamtripathi‬
‪#‎anupamtripathiG‬
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6 Comments

  1. Panna - December 30, 2015, 9:53 pm

    anupam kavya rachana!

  2. Anjali Gupta - December 30, 2015, 10:03 pm

    true…each word 🙂

  3. Ajay Nawal - December 30, 2015, 11:19 pm

    nicely written…true poem

  4. Akanksha Malhotra - December 31, 2015, 1:23 am

    Bahut Khoob 🙂

  5. Satish Pandey - September 8, 2020, 10:37 pm

    बहुत खूब

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