Tag: बापू पर कविता

  • HINDUSTAN

    जिन्दा रहे मेरा हिंदुस्तान
    अद्भुत है जिसका गुणगान

    सशक्त युवा का प्रबल ईमान
    खुली हवा में भिखरा सम्मान
    हिमालय जैसा पर्वत तुझको
    शीश झुका करता प्रणाम..

    सबसे प्यारा सबसे न्यारा
    समुद्र का ये अद्भुत किनारा
    जहाँ गाँधी में गंगा की धारा
    कर्क पे चमकता सूरज हमारा

    शहादत पर जो दे बलिदान
    पलकें झुका आँखों से सलाम
    रहे तिरंगा सबसे ऊँचा
    समृद्ध भारत की बुलंद पहचान

    जिन्दा रहे मेरा हिंदुस्तान
    अद्भुत है जिसका गुणगान
    © M K Yadav

  • आज़ादी

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    दृढ़ निश्चय लेके निकले
    मुसीबत को निकाला जड़ से उखाड़
    ये देश भक्त हुए दुनिया में विख्यात
    जब लहू से लिखा इन वीरो ने भारत माँ का नाम

    करने आये थे व्यापार
    और कर रहे थे देश को बर्बाद
    देश के वीरो ने किया
    इन अंग्रेज़ो से हमे आज़ाद

    कठिन था हराना
    मजबूत थे जज्बात
    अंग्रेज़ो पे फ़तेह पाकर
    इस देश को किया आबाद

    मुसीबत की लेहरो को
    अपने जोश से मोड़ दिया
    जिस घमंड से आये थे अंग्रेज़
    उस घमंड को भी भारत के वीरो ने तोड़ दिया

    गाँधी ,नेहरु ,पटेल , सुभाष ने
    इस देश को आज़ादी दिलाई
    भगत , राजगुरु और , सुखदेव की
    क़ुरबानी से हर देशवासी की आँखे भर आई,

    दिखाई एकता की ताकत
    हुआ भारत विख्यात पूरे जहान में
    बुरी नज़र वालो दूर रहना
    ऐसे और वीर है इस हिंदुस्तान में

    फेहराओ तिरंगा
    याद रखो उन वीरो को
    भारत माँ की रक्षा
    की तोड़के अंग्रेज़ो की जंजीरो को

    देश का त्यौहार है आया
    खुशियाँ मनाओ और बांटो मिठाइयाँ
    आप सभी देशवासियो को
    स्वतंत्रता दिवस की खूब बधाइयाँ

    – अंशुल ओझा

  • शहीद

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    कृतज्ञ देश है उन वीरों का
    जिसने लहू बहाया अपना
    देश की खातिर तन मन धन
    सब कुछ है लुटाया अपना
    बलिदान दिया है कितनी मां ने
    कितनी बहनों ने है भाई खोया
    आज शहीदों को नमन किया
    आज देश है खूब रोया
    सारी जवानी भेंट चढ़ा दी
    अपनी भारत मां के लिए
    दिवाली पर घर आंगन से पहले
    शहीदों की चिताओं पर जले दिए
    अनमोल दिया है तोहफा हमको
    हम सब की आजादी का
    गांधी देश के वासी हो तुम
    तो कपड़े पहनो खादी का
    एक प्रतिज्ञा फिर से ले लो
    सवा सौ करोड़ तुम हिंदुस्तानी
    अब न वतन से करने देंगे
    दुश्मन को अपनी मनमानी
    दुश्मन को अपनी मनमानी

    – वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • 15 अगस्त , स्वतंत्रता का पर्व

    बहुत देखी गमगीन गुलामी आजादी के वीरों ने
    कतरा कतरा बहा दिया भारत माता के चरणों में
    भारत देश हमारा सोने की चिड़िया कहलाता था
    देश का परचम खुले गगन में लहर -लहर लहराता था
    आजादी का अखण्ड दीप तब नित नवनित होकर जलता था
    सतयुग ,त्रेता ,द्धापर युग का संस्कार तब मन में बसता था
    राम कृष्ण के पद चिन्हों पर हर मानव अपनी रचना रचता था
    आया कलियुग कुटिल नीति का दुश्मन ने पासा खेला
    भारत माता के चरणों को अपनी गद्दारी से तोला
    हुये आक्रमण बार बार दुःख की काली बदरी छाई
    व्यक्तिवाद और राष्ट्रवाद की भयंकर हुई लड़ाई
    देशभक्ति और आजादी की तब हमने कसमें खांई
    खूब लड़ी मर्दानी तो पद्मावती ने जौहर दिखलाया
    छँटा अँधेरा गुमनामी का ,वीरों का बलिदान हुआ
    भारत माता की आजादी के लिए भारी एक संग्राम हुआ
    हुआ उदित सूर्य 15 अगस्त को ,धूप सुनहरी बिखर गई
    धरती से अम्बर तक नभ में प्यारी लाली छाई
    वीरों का बलिदान अमर करने की अब अपनी बारी आई
    उठा शस्त्र अब प्रेम अहिंसा का लोगों में उन्माद भरो
    हो कहीं न अब खून की होली
    दीवाली के दीप जलें
    आओ अथक प्रयासों से इस देश की नींव भरें
    पुनः जगा दें गाँधी सुभाष और तिलक की भावना जन जन में
    देश भक्ति का राग निहित हो हर मानस और जन जन में। ।

  • पाकिस्तान के दो टुकड़े

    1971 में जब इन्दिरा गाँधी जी ने
    पाकिस्तान के दो टुकड़े किये थे।
    तब चीन मुँह ताकता रह गया था।
    उफ़ तक ना निकली थी मुँह से
    और अमेरिका, रूस जैसे देश
    चूँ तक ना बोले बस
    दाँतों तले उंगली दबा कर रह गए।
    ऐसा था आयरन लेडी का फैसला
    और भारत का औधा।
    जिसे मोदी जी ने भी
    बरकरार रखा है।
    आज भी हर देश भारत की
    सराहना करता है।
    और सम्मान से देखता है।
    मैं इन्दिरा गाँधी जी के
    इस फैसले की सराहना
    करते हुए उन्हें नमन करती हूँ।
    चीन का भी हाल यही होना चाहिए।

  • हमन प्रबुधिया नोएन गा

    “हमन परबुधिया नोएन गा”
    **************************

    जांगर पेरत पसीना चुचवावत,
    भुइय्या के छाती म अन उगावत,
    चटनी बासी के खवैय्या आवन न,
    येहर धान के कटोरा हावे गा,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    मोर छाती म बिजली पानी,
    रुख राई अउ जंगल झाड़ी,
    कोयला के खदान हावे गा,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    चारो मुड़ा हे नदिया नरवा,
    हीरा लोहा टिन के भंडार हावे,
    इहाँ के लोहा जपान जाथे न,
    बैलाडीला भिलाई महान हावे,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    इहाँ के जंगल म तेंदू पत्ता,
    साल सागौन के रवार हावे न,
    हर्रा बेहड़ा चार महुवा तेंदू,
    लाख कत्था अउ जड़ी बूटी,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    इहाँ के भुइय्या म महानदी,
    अरपा पैरी अउ इंद्रावती न,
    तीरथगढ़ चित्रकूट झरना हावे,
    खारुन शिवनाथ केलो रेंड नदियां,
    मैनपाट घलो स्थान हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    सबले ऊँचा गौरालाटा हावे न,
    महामाया अउ बम्बलाई माता,
    सम्बलाई माई दन्तेश्वरी दाई,
    गंगरेल अउ हसदो बाँध हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    हैहयबंसी राज करिस इहाँ,
    पाण्डबंसी अउ सोमबंसी राजा,
    सिरपुर अउ रतनपुर के घलो,
    इतिहास ह भारी हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    लक्ष्मण मंदिर भोरम देवा,
    कैलाश गुफा अउ मंदकुद्वीपे,
    इहाँ ये सबो स्थान हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    वीरनरायन जइसे सपूत महान,
    स्वामीआत्मानंदा गुरु घासीदास,
    सुंदर लाल शर्मा इहाँ गाँधी घलो न,
    एखरे सेती भीम बोलत हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    रचनाकार
    सहाशि योगेश ध्रुव”भीम”

  • भोजपुरी देशभक्ति गीत-भारत देशवा हमार |

    भोजपुरी देशभक्ति गीत-भारत देशवा हमार |
    जहा बहे गंगा निर्मल धार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    उत्तर हिमालय गगनवा के चूमे |
    दखिन सगरवा लहरवा मे झूमे |
    लहकल खेतवा बहे पूरवा बयार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    जहा के जवान सिमवा पर दहाड़ेले |
    धई दुशमनवा बहिया उखाड़ेले |
    एक के बदले बदला चुकावेले हजार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    बिंध बिंधवासिनी वैशणु जम्मू बिराजेली |
    कामरूप कामाख्या दखिन काली माई साजेली |
    देवघर बाबाधाम होला जय जय जैकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    झरखांड बिहार बाड़े देशवा के शान हो |
    यूपी गुजरात आज हऊवे मोर जान हो |
    रामराज आइल देशवा जगवा बधाई सरकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    झाँसी क रानी माहाराणा के देशवा |
    आजाद भगत सिंह गांधी शुभाष के देशवा |
    फह फह फहरे झण्डा माने सारा संसार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    थर थर काँपे दुश्मन कुंवर सिंह के नाम हो |
    मारी तलवरिया करे दुशमन तमाम हो |
    काटी के बहिया आपन चढ़ावे गंगा जी के धार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    बीर बिरसा के गाथा बखान हम करीला |
    सिधु कान्हु के परणाम उनके नाम हम करीला |
    झन झन तेगवा करे दुश्मन के ललकार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |
    देशवा के माई हरदम शेरवा जनमावेली |
    दुधवा पियाई उनकर सिनवा बढ़ावेली |
    आवे न पावे दुश्मन सीमा यही पार |
    उहे बाटे भारत देशवा हमार |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • भोजपुरी कविता- भारत देशवा

    भोजपुरी कविता- भारत देशवा
    दुनिया मे सबसे महान |
    भारत देशवा मोर जान |
    कश्मीर से कन्याकुमारी
    हऊवे एक ही दुआरी |
    यूपी बुहार बाड़े शानवा हमार |
    हरियाणा पंजाब उगावे सोनवा बघार |
    गुजरात राजस्थान दुधवा अघान |
    भारत देशवा मोर जान |
    उड़ीसा बंगाल हऊवे चऊरा के खान |
    खनिजवा के खान झारखंडवा के नाम |
    महाराष्ट्र आंध्रा अऊरी मध्य प्रदेश |
    तमिलनाडु देले सबके सुंदर संदेश |
    करी केतना देशवा गुणगान |
    भारत देशवा मोर जान |
    केरल कर्नाटक ज्ञानवा भंडार |
    जंबू कश्मीर करे सिमवा खबरदार |
    लद्दाख हिमाचल अरुनाचल अखंड |
    उत्तराखंड ठंडा शीतल बहे हवा प्रचंड |
    कही फड़के बीर भुजा हिंदुस्तान |
    भारत देशवा मोर जान |
    कही जन्मे महारणा कही लक्ष्मी बाई |
    सम्राट आशोक चमके लीलार दुहाई |
    आजाद भगत गरजे कही नेता शुभाष |
    अहिंसा पुजारी पिता गांधी देशवा आस |
    देव ऋषि मुनि जन देवे देशवा वरदान |
    भारत देशवा मोर जान |

    श्याम कुँवर भारती [राजभर] कवि ,लेखक ,गीतकार ,समाजसेवी ,
    मोब /वाहत्सप्प्स -9955509286

  • Ajad Hind

    आजाद हिंद के आज आजाद हैं हम,
    खुला आसमां है आज हमारे सर पर,
    नहीं किसी की हुकूमत है हम पर,
    उन्मुक्त गगन के आज आजाद पंछी हैं हम,
    श्रेय इसका है उन वीर सपूतों का,
    जिन्होंने हैं प्राण गवाए हिंद पर,
    महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन का,
    जिन्होंने भगा दिया अंग्रेज को,
    उनका कर्ज है हमारे सर पर,
    हम सारे भूल गए उनके उपकार को,
    कुछ तो रहम करो मेरे प्यारो,
    याद करो उनकी कुर्बानी को,
    जिन्होंने हैं प्राण गवाएं देश पर,
    अब तो सब की परी है अपनी,
    नहीं देश की चिंता है सर पर,
    चाहे जितना भी करो गंदा,
    चाहे जितना भी लूटो नोचो,
    इघर से लूटो उधर से नोचो,
    बस मेरा मेरा की रट लगी है,
    क्या कभी सोचा है तुमने ?
    आज की आजादी मिली है कैसे ?
    होश में आओ मेरे वतन के लोगों,
    होश में आओ मेरे वतन के लोगों |

  • महात्मा गाँधी

    चले हम उस रह पर,जो रह बापू ने दिखाई,
    छलके चरित्र मे सबके सदा जीवन और सचाई |
    खुशियों से भर जाये हर एक आंगन,
    देश को चाहिए गाँधीवादी शासन |

    बिना खून बहाये, बिना चोट पहुंचाए
    अंग्रेज उन्होंने मार भगाए
    उच्च कर्म करके बढाया देश का मान
    गाते रहते
    “रघु पति राघव राजा राम
    पतित पावन सीता राम ”
    इस दशहरे जाला दो मन का रावन
    देश को चाहिए गांधीवादी शासन

  • महात्मा गाँधी

    हर साल मेरी पुस्तक (हिंदी )मे,
    महात्मा गाँधी का पाठ जरूर होता है |
    बापू का व्यक्तिव याद करता हूँ,
    तो “सदा जीवन, उच्च विचार ” याद आता है |

    बापू फिर से आकर,
    देश बचा लो,
    क्रांति बिगुल बजाकर |

    तुमने जो जलाया उम्मीद का दिया,
    मशाल वो बन गया था |
    दुगने लगान के आगे तब,
    हर किसान तन गया था |

    भुखमरी, महामारी से अंग्रेजो को क्या लेना था,
    अकाल से देश शमशान बन गया था |
    लाठियों की मार से गोलियों की बौछार से,
    देश का कोना -कोना खून से सन गया था |

    राष्ट्रपिता तुम हमारे, हो साबरमती के संत,
    दांडी मार्च करके, नमक कानून का किया अंत |
    एक आवाज पे उठ खड़े हुए देशवासी अनंत,
    चरखे की तरहा घुमा दिया सरकार को,
    मिला मिटटी में कर दिया उसका अंत |

    अब देश का वर्तमान हाल बदला,
    100 का नोट 1000मे बदला, 200 का दो हजार मे|
    देखो बापू,
    भ्रष्टाचारी लूट खा गए,
    देश को बेच स्विस बाजार मे |
    बापू फिर से आकर,
    देश बचा लो,
    क्रांति बिगुल बजाकर |

  • गांधी मशाल

    जिनके एक आवाहन पर सबने अपने हाथ उठाये थे,
    कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के छक्के साथ छुड़ाए थे,

    जिनके कहने पर अस्त्र वस्त्र सब मिलकर साथ जलाये थे,
    सत्य-अहिंसा के अचूक तब शस्त्र सशक्त उठाये थे,

    सच की ताकत के आगे जब तोपो के रंग उड़ाए थे,
    गांधी मशाल ले हाथ सभी ने विदेशी दूर भगाए थे,

    सत्याग्रह की आग लिए जब मौन रक्त बहाये थे,
    मानवता और अधिकारों का खुल कर बोध कराये थे,

    डांडी यात्रा में गांधी जी जब समुद्र किनारे आये थे,
    जाति धर्म के तोड़ के बन्धन जन पीछे-पीछे आये थे,

    पोरबन्दर में जन्म लिया पर हर मनमन्दर पे छाए थे,
    दुबले पतले थे पर बापू देखो वीर कहाये थे,

    ब्रिटिश राज को ध्वस्त किये और आजादी के रंग दिलाये थे,
    यूँही भारत माँ के आँचल पर बापू ने पुष्प चढ़ाये थे।।
    राही (अंजाना)

  • महात्मा गांधी

    महात्मा गांधी

    महात्मा गांधी
    ——————
    🙈🙉🙊

    बाहर से गंभीर धीर,👴
    जज्बों से थे तूफानी।🌋

    अंग्रेजों के पैर उखाड़ गए,
    वो नाम था गांधी।🤓

    अल्पाहारी, शाकाहारी, 🌿🌾
    सत्य निष्ठ, अवतारी,👼

    बैरिस्टर से साधु बन गए,
    मानवता के पुजारी ।👤

    आजादी के आंदोलन में थी,
    उनकी भागीदारी ।👥👥👥👥

    सत्य अहिंसा पथ पर चलना,
    👣👣 माना जिम्मेदारी।

    चंपारण ,खेड़ा, के नायक,
    गांधी थेआंदोलनकारी ।👀

    जेल भरो आंदोलन की ,
    कर डाली थी तैयारी ।
    👩‍👧‍👦👩‍👧‍👧👨‍👨‍👧‍👧👭👬👫👨‍👨‍👦‍👦👨‍👧‍👦👨‍👧‍👧👨‍👩‍👧

    अपनी जान की परवाह ना की,
    देश की ली जिम्मेदारी।🏋️

    दांडी मार्च के महानायक ने,
    दी थी गिरफ्तारी🥨

    स्वदेशी वस्तुएं सभी थी ,
    उन्हें बहुत ही प्यारी ।🏝️

    असहयोग आंदोलन की भी,
    आ गई थी अब बारी।
    🔥🔥
    दया दिलों में भरना,
    इसमें भी थी हिस्सेदारी।
    👧👦👩‍🎓👩

    आजादी की अलख जगा कर ,
    चेताये नर- नारी ।
    🌋
    चरखा चलाते ज्ञान बांटते,
    देश पे थे बलिहारी ।,🇮🇳

    सादा जीवन उच्च विचार,
    गांधीजी धर्माचारी।👳

    राष्ट्रपिता वो बापू थे,
    धोती और सोटा धारी ।👣

    अंग्रेजों को उडा गए ,
    गांधी जी थे वो आंधी।🌪️🌀

    निमिषा सिंघल🌞

  • ‘गांधी’ एक विचारधारा

    गांधी जी पर कविता तो हर कोई रचते हैं।
    आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं।

    बापू ने कहा था बुरा मत देखो।
    मैं मुँह फेर लेता हूँ,
    देख कमजोरों पर अत्याचार होते।
    मैं आँखें फेर लेता हूँ,
    देख शोषण और भ्रष्टाचार होते।
    मुझे वो कागज का टुकड़ा भाता है।
    जिस पर छपा बापू मुस्कुराता है।
    बुरा तो मैं देखता ही नहीं,
    मुझे बस हरा ही हरा नजर आता है।
    बुरा कर, ईश्वर से हम क्यों नहीं डरते हैं।
    आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं।

    बापू ने कहा था बुरा मत सुनो।
    मैं कान बंद कर लेता हूँ,
    करुण चीख पुकार सुनकर।
    कानों में हाथ रख लेता हूँ,
    सहायता की चीत्कार सुनकर।
    मदद की गुहार मेरे कानों में चुभता है।
    बेमतलब की बातें कौन यहाँ सुनता है।
    बुरा तो मैं सुनता ही नहीं,
    चापलूसी कानों में शहद बन घुलता है।
    हृदय किसी का दुखाकर हम कैसे हँसते हैं।
    आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं।

    बापू ने कहा था बुरा मत बोलो।
    मैं मुँह बंद कर लेता हूँ,
    जहाँ सच बोलने की आवश्यकता हो।
    मैं होंठ सील लेता हूँ,
    फिर भले ही निर्दोष क्यों न मरता हो।
    झूठों का बोल बाला है।
    सत्य कहाँ बचने वाला है।
    बुरा तो मैं बोलता ही नहीं,
    पैसों ने मुँह बंद कर डाला है।
    क्यों भूल जाते हम, सत्य कहाँ मरते हैं।
    आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं।

    बापू को न केवल,
    तस्वीरों, मूर्तियों में जगह दो।
    उन्हें दिल में उतारो,
    आदर्शों का अलख जगा दो।
    सत्य और अहिंसा ही,
    आत्मा को परमात्मा बनाता है।
    गांधी जी के विचार ही,
    गांधी को महात्मा बनाता है।
    मजहब के नाम पर, हम क्यों लड़ते हैं।
    सत्य, अहिंसा का पाठ क्यों नहीं पढ़ते हैं।
    गांधी जी पर कविता तो हर कोई रचते हैं।
    आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • महात्मा गाँधी

    गुलामी की धांस में अत्याचारों की बांस में
    देश था बिलकुल सड़ गया |
    तब उठ खड़ा हुआ एक अहिंसक योद्धा,
    जो लाठी लिए फिरंगी से लड़ गया |
    कुचलता हुआ अंग्रेजी सरकार के इरादे,
    जनक्रांति लिए वो आगे बढ़ गया |
    अंग्रेज देना चाहते थे धोखा,
    पर वो पूर्ण स्वराज पर अड़ गया |

    बर्तानिया सरकार के खिलाफ,
    शोले भड़क रहे थे हर मन में |
    जलाकर विदेशी वस्तुएँ ,
    आजादी की आग लगा दी हर जन में |
    भारत छोड़ो आंदोलन का तूफान ऐसा चलाया,
    और जोश भर दिया हर देशवासी के तन में |
    बापू तुमने आजादी दिलाई,
    याद रहेगा हमें पुरे जीवन में |

    आजादी का सूरज उगा,
    पर ग्रहण लगा बंटवारे का |
    रोए बापू रोए भारत,
    दुःख था छूटते अँगनारे का |
    नये भारत के स्वर्णिम भविष्य के,
    आँखों में तुम्हारे कई सपने थे |
    पर घात लगाए क्रूर दुष्टाचारी,
    नाथू राम जैसे दुश्मन अपने ही थे |

    आजाद आसमान हमें दिया,
    और गुलामी की जंजीरो को तोड़ चले |
    खुद मरकर जीवनदान हमें दिया,
    और हर मोती को एक मला में जोड़ चले |
    लपेट तिरंगा झंडा शान से,
    अपना विजय रथ अंतिम यात्रा की ओर मोड़ चले |
    कभी ना ख़त्म होने वाले आँसू,
    अब हमारी आँखों में छोड़ चले |

  • मेरे बापू गांधी जी

    मेरे बापू गांधी जी

    मेरे बापू गांधी

    दयावान मृदु भाषी बापू का स्वभाव था
    सत्य अहिंसा मेरे बापू का हथियार था
    राष्ट्रवादी शांतिप्रिय बापू का उपदेश था
    हिंदुस्तान के मर्यादा का बापू को ज्ञान था

    गर्व था देशवासियों को बापू के हुंकार पर
    ऐंनक पहने लाठी लेकर देश को आजाद किया
    खट्‌ खट्‌ की आवाज में बापू का प्यारा संदेश था
    चरखे के बल पर बापू ने रचा स्वर्णीम इतिहास था

    गोरों को औकात दिखाया उनके ही चालो में
    राष्ट्रहित में ध्वजा फहराकर देश का मान बढ़ाया
    बापू के पीछे पीछे हिन्द सेना जब चलती थी
    गोरों कि फौज डरें सहमे छिपते फिरती थी

    गोरों के अत्याचारों से गली मोहल्ला थर्राया था
    बापू ने अपने आंदोलन से गोरों को पस्त किया था
    गोरे शैतानों को उनके भाषा में सबक सिखाया
    बापू के चरणों का मैं शीश झुका वन्दन करता हूं

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • महात्मा गांधी

    गांधी नहीं सिर्फ नाम है, वो देश का मान है
    नोटों पर देख तस्वीर, ना सोचो खास इंसान है
    वो हममें से ही आने वाला बिल्कुल आम इंसान है
    सिर्फ और सिर्फ भारत में ही, बसती उनकी जान है

    आंख पर चश्मा, हाथ में लाठी, सत्य अहिंसा पहचान है
    नायक नहीं वे जननायक, अंग्रेज़ो मे खौफ उनकी पहचान है
    हर जन गण में जगाना प्रेरणा, उनकी ताकत का राज है
    कठिनाईयों को पीठ नहीं दिखाना, सीखने की जरूरत उनसे आज है

    मुख पर राम; दिल में राम, पर सम्मान सभी धर्मो का था
    जातिवाद,रंगवाद मिटा, वो नायक बना कर्मो से था
    वो था अकेला चल पड़ा तो पीछे, जुड़ता गया इक पूरा रेला था
    इक आग उसने जला दी ऐसी, बस हर ओर देशभक्तों का मेला था

    उम्र के साथ कमजोर ना पड़कर, रुकना नहीं सिर्फ बढ़ना है
    इक ही जीवन देश को अर्पण, करना उनसे सीखना है
    सिर्फ शस्त्रो से ही युद्ध का, निर्णय कभी ना होता है
    सीखना उनसे सत्य के संग ही, जीवन सत्य होता है

    आज पितृ पुरुष वह महानायक, रहता राजघाट समाधि में
    गांधीगिरी का घोल दिया रस, देश कि पूरी आबादी में
    इनके ऋण से देश कभी , उऋण नहीं हो सकता है
    इनके चरणों की धूल से पावन, कुछ भी नहीं हो सकता है

  • महात्मा गांधी

    कारण जिसके हर हिंदवासी, आजाद हवा में रहता है
    कारण जिसके आज विदेश में, सर उठा के भारत चलता है
    उस मां भारत के वीर पुत्र को, श्रद्धा सुमन चढ़ाने आया हूं
    मै उस आंधी जिसका नाम था गांधी कि गाथा गाने आया हूं

    2 अक्टूबर 1869 , पोरबंदर बड़ा हर्षाया था
    करमचंद और पुतलीबाई के, घर पर मोहन आया था
    हां करी शैतानी; अठखेली, और कई बदमाशी भी
    जब पकड़ी राह सत्य के पथ कि, मिली सिर्फ शाबाशी ही

    वे प्रेरणापुंज वह राष्ट्रकुंज, दिव्य ज्योत जलाने आये थे
    सत्य, अहिंसा, देशभक्ति का, पाठ पढ़ाने आये थे
    वह धर्म; छूत का भेद मिटा, समरसता सिखाने आये थे
    जन मन में राष्ट्रभक्ति जगा, अंग्रेज़ भगाने आये थे

    वे रुके नहीं वे झुके नहीं, खाकर लाठी भी डिगे नहीं
    हासिल जब तक ना हुई आजादी, रण क्षेत्र छोड़ वे भगे नहीं
    वह राष्ट्रपिता; वह महात्मा, उनके दिल में भारत बसता है
    आज भारत के दिल में वे और हर हृदय में गांधी बसता है
    जन जन के दिल गांधी में बसता है

  • महात्मा गाँधी

    हर साल मेरी पुस्तक (हिंदी)मे,
    पाठ महात्मा गाँधी का होता है,
    बापू का व्यक्तित्व याद है पर,
    असल जिंदगी मे कोई असर नहीं इसका होता आता है |

    बापू फिर से आकर,
    देश बचा लो, क्रांति बिगुल बजाकर |

    तुमने जो जलाया उम्मीद का दीया,
    मशाल वो बन गया था |
    दुगने लगाना के आगे तब,
    हर किसान तन गया था |

    भुखमरी, महामारी से अंग्रेजो को क्या लेना था,
    अकाल पड़ कर देश शमशान बन गया था |
    लाठियोंऔर गोलियों के प्रहार से,
    देश का कोना कोना खून मे सन गया था |

    राष्ट्रपिता तुम हमारे, साबरमती के हो संत,
    तुम्हारी एक आवाज पे देशवासी खड़े हो गए अनंत,
    दांडी मार्च करके, किया नमक कानून का अंत,
    चरखे की तरहा घुमा दीया सरकार को,
    मिलाकर मिटटी मे किया उसका अंत |

    आज का हाल देश का देखो,
    100 का नोट 1000 मे बदला, 200 का दो हजार मे,
    देखो बापू, भ्रष्टाचारी लूट खा गए,
    देश को बेच दीया स्विस बाजार में |

    सब भूल गए तेरे बलिदान बेशरम बनके,
    अब तो बक्सों में बंद होकर रह गए,
    गाँधी काला धन बनके |

    बापू फिर से आकर,
    देश बचा लो, क्रांति बिगुल बजाकर |

  • मेरे बापू गांधी जी

    मेरे बापू गांधी जी

    मेरे बापू गांधीजी

    दयावान मृदु भाषी बापू का स्वभाव था
    सत्य अहिंसा मेरे बापू का हथियार था
    राष्ट्रवादी शांतिप्रिय बापू का उपदेश था
    हिंदुस्तान के मर्यादा का बापू को ज्ञान था

    गर्व था देशवासियों को बापू के हुंकार पर
    ऐंनक पहने लाठी लेकर देश को आजाद किया
    खट्‌ खट्‌ की आवाज में बापू का प्यारा संदेश था
    चरखे के बल पर बापू ने रचा स्वर्णीम इतिहास था

    गोरों को औकात दिखाया उनके ही चालो में
    राष्ट्रहित में ध्वजा फहराकर देश का मान बढ़ाया
    बापू के पीछे पीछे हिन्द सेना जब चलती थी
    गोरों कि फौज डरें सहमे छिपते फिरती थी

    गोरों के अत्याचारों से गली मोहल्ला थर्राया था
    बापू ने अपने आंदोलन से गोरों को पस्त किया था
    गोरे शैतानों को उनके भाषा में सबक सिखाया
    बापू के चरणों का मैं शीश झुका वन्दन करता हूं

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • सच

    * सच *

    अब तो
    बाज़ारों में
    बेचारी सच्चाई
    सिसकियाँ भरती हैं
    कोई भी
    ख़रीददार नहीं उनका
    जो भी आता है
    बेईमानी , मक्कारी
    ख़रीद कर ले जाता है
    हां , कभी कभार
    भूला भटका
    कोई जिस्म
    आ जाता है
    ‘ सच ‘ ख़रीदने
    न तन पर
    पूरे कपडे़
    कमबख़्त पेट भी
    पीठ से चिपकी हुई
    फ़िर भी
    ख़रीदने आ जाते हैं सच
    चंद ऐसे ही
    लोगों से
    सच्चाई की झोपड़ी में
    सब्र ओ सुक़ून की
    अंगिठियां जलती हैं
    तभी तो
    वो आज भी
    बापू ( गांधी ) के
    इस देश में
    ज़िंदा है… ! ! !
    – कुन्दन श्रीवास्तव

  • Mahatma Gandhi

    आजाद भारत के तुम हो
    मसीहा, गांधी तेरी यही पहचान,
    सत्य अहिंसा और धर्म का.
    तूने बनाई एक मिसाल.
    सादा जीवन उच्च विचार का,
    दुनिया को सिखलाया पाठ,
    नतमस्तक होकर अंग्रेज भी,
    छोड़ कर चले गए अपने देश,
    आंखों पर चश्मा हाथ में लाठी,
    कमर में धोती, तेरा था यही लिबास,
    सिखाया आपने दुनिया को,
    हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई,
    आपस में है भाई भाई.
    भारत छोड़ो आंदोलन है
    तेरा ही नारा, दिया भारतवासियों को
    तूने, स्वदेशी हो कपड़ा अपना,
    चरखा है तेरी पहचान,
    रघुपति राघव राजा राम,
    ईश्वर अल्लाह तेरे नाम,
    तेरा था यही गान, सत्याग्रह,
    असहयोग पर दिया था जोर,
    तभी तो राष्ट्रपिता का दर्जा पाया |

  • महात्मा गांधी

    ना उठाया शस्त्र कभी ना हिंसा अपनाई थी ,
    अंत समय पर उनके राष्ट्र में खामोशी छाई थी ;
    सौराष्ट्र प्रांत का संत वहां था ,
    राष्ट्रप्रेम उसका अनंत था ;
    देकर आजादी बापू कहलाया ,
    आजादी का गान है गाया ;
    सत्ता का न लोभ उसे था ,
    राष्ट्रपिता का दर्जा पाया ;
    विश्वकल्याण स्वप्न था उसका ,
    निर्मल अंतर्मन था उसका ;
    जीवन समर्पित किया देश को ,
    किया नमन सदैव अवधेश को ।
    सत्याग्रह,असहयोग पर दिया था उसने जोर ;
    सतत प्रयास के फलस्वरूप हुई थी आजादी की भौर रघुपति राघव गाता था वो,
    चरखा सदा चला था वो;
    स्वावलंबी था वह मानव ,
    नहीं रोक पाया कोई दानव ;
    अंग्रेजों को रोका जिसने ,
    वही राष्ट्रपिता है कहलाया ।

  • मेरे बापू गांधी

    मेरे बापू

    चरखा के बल पर जिसने
    देश भक्ति को जगाया था
    गजब का हुंकार था
    बापू के जज़्बातों में

    सत्य अहिंसा की लाठी से
    जिसने धुल चटाया था
    खदेड़ गोरों के सैनिक को
    देश का मान बढ़ाया था

    गोरों को लोहे का चना चबवाया
    देश को अपने आजाद कराया
    सत्य अहिंसा का लेकर अस्त्र शस्त्र
    बापू ने भारत देश का गौरव बढ़ाया

    गोरों के अत्याचारों से गली शहर सहमे थे
    बापू के आहट से ही गोरे डरें डरें छिपते थे
    बापू के आगे गोरे भी नतमस्तक थे
    ऐंनक पहने लाठी लेकर देश पर समर्पित थे

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • बापू

    बापू

    जिनके एक आवाहन पर सबने अपने हाथ उठाये थे,
    कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के छक्के साथ छुड़ाए थे,

    जिनके कहने पर अस्त्र वस्त्र सब मिलकर साथ जलाये थे,
    सत्य-अहिंसा के अचूक तब शस्त्र सशक्त उठाये थे,

    सच की ताकत के आगे जब तोपो के रंग उड़ाए थे,
    गांधी मशाल ले हाथ सभी ने विदेशी दूर भगाए थे,

    सत्याग्रह की आग लिए जब मौन रक्त बहाये थे,
    मानवता और अधिकारों का खुल कर बोध कराये थे,

    डांडी यात्रा में गांधी जी जब समुद्र किनारे आये थे,
    जाति धर्म के तोड़ के बन्धन जन पीछे-पीछे आये थे,

    पोरबन्दर में जन्म लिया पर हर मनमन्दर पे छाए थे,
    दुबले पतले थे पर बापू देखो वीर कहाये थे,

    ब्रिटिश राज को ध्वस्त किये और आजादी के रंग दिलाये थे,
    यूँही भारत माँ के आँचल पर बापू ने पुष्प चढ़ाये थे।।

  • गांधी

    जिनके एक आवाहन पर सबने अपने हाथ उठाये थे,
    कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के छक्के साथ छुड़ाए थे,

    जिनके कहने पर अस्त्र वस्त्र सब मिलकर साथ जलाये थे,
    सत्य-अहिंसा के अचूक तब शस्त्र सशक्त उठाये थे,

    सच की ताकत के आगे जब तोपो के रंग उड़ाए थे,
    गांधी मशाल ले हाथ सभी ने विदेशी दूर भगाए थे,

    सत्याग्रह की आग लिए जब मौन रक्त बहाये थे,
    मानवता और अधिकारों का खुल कर बोध कराये थे,

    डांडी यात्रा में गांधी जी जब समुद्र किनारे आये थे,
    जाति धर्म के तोड़ के बन्धन जन पीछे-पीछे आये थे,

    पोरबन्दर में जन्म लिया पर हर मनमन्दर पे छाए थे,
    दुबले पतले थे पर बापू देखो वीर कहाये थे,

    ब्रिटिश राज को ध्वस्त किये और आजादी के रंग दिलाये थे,
    यूँही भारत माँ के आँचल पर बापू ने पुष्प चढ़ाये थे।।
    राही (अंजाना)

  • देश भक्ति

    गांधी,भगत,चद्रशेखर ,झाँसी की महारानी
    हम सब की खातिर जिसने,अपनी जान गवा दी

    अम्बर से धरती पर आये,ये वतन बचाने
    आज़ादी क्या होती है,ये मूल पाठ पढ़ाने

    -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-

  • काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती

    ✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती ,
    शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,,
    तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती।
    रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है गद्देदार ,,
    अगर बच्चे प्रर्थाना करते तु ही राम है,तु रहीम है, तु करीम —–
    तो सौ वर्षो से हो रही गाथा मे भेद बताकर मुल्क को बाटँते हो गद्देदार,
    अब बस करो अपनी रोटी सेकना गदे्दार मेरे बच्चे के हाथ मे फुल के बदले हथियार देना बंद करो।
    मेरे मुल्क को मत बाँटो तु बाँट लो अपना परिवार हो सके तो छोड़ मेरे मुल्क को चल जा दुसरे मुल्क के गद्देदार को पकड़ ले तु हाथ,,
    मेरे मुल्क को मत बाँटो गद्देदार।।
    खुन पसीना से सीचा है गाँधी इसे मत तु कर वर्वाद ,
    तु छोड़ दे मेरे मुल्क को गद्देदार।।✍✍✍
    ज्योति

  • टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन

    मित्रो! अभी हाल ही मे शहीद हुए हमारे देश के चार सैनिको
    को ,अपनी कविता के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये, मैने आप तक ए कविता पहुचाने की कोशिश की है
    अगर आपको ये कविता पसंद आये तो ये बात देश के अन्य लोगो तक पहुचाने की कोशिश करे।
    जय हिंद जय भारत

    टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन ।
    मांगो के सिंदूर पूछते यह अन्याय भरेगा कौन ।।

    सीमा पर से उस प्रहरी की आवाजे है चीख रही।
    मेरे बलिदानो की बोलो कीमत भला भरेगा कौन।।

    मै भारत का कलमकार हू
    अपनी भाषा बोल रहा हूँ ।
    प्रजातंत्र के सरदारो से
    नया प्रश्न अब खोल रहा हूँ।।

    कब तक मौन रखोगे अपनी
    चमक ढाल तलवारो की ।
    कब और दंश सेना के ऊपर लगते जायेंगे
    कब तक कायर दुश्मन के हम रोज तमाचे खाएंगे।।

    कब तक मांग भरी, बिधवाए
    सिंदूरो को पोछेंगी।
    कब तक माँ ये बेटो के हित
    ह्रदयस्थल को नोचेंगी ।।

     

    कब तक बहना की राखी का
    अग्निध्वंश करवायेंगे।
    कुछ तो बोलो कब तक
    सैनिक की लाशे उठवाएंगे।।

    चार बीर बलिदानों का
    यह घाव कौन हर सकता है।
    सिंदूरो से सजी मांग
    अब भला कौन भर सकता है।।

    कौन जोड़ पायेगा वह दिल
    माँ का जो शीशे सा टूट गया।
    कीमत कौन चुकायेगा उन हाथों का
    जो राखी को लिए खड़ी बहना से भी छूट गया।।

    वह तो है नादान पड़ोसी
    न जाने किस पर ऐठा है।
    दो बार लात खा करके भी
    फिर आघातों को बैठा है।।

    दो ,दो बार माफ करने का
    यही नतीजा आया है।
    गाँधीवादी अरमानो ने
    फिर से थप्पड़ खाया है।।

    सत्य अहिंसा को अपनाकर
    मतलब इसका भूल गये।
    भूल गये कुर्बानी उनकी
    फाँसी पर जो झूल गए।।

    जब जब अपना इतिहास भूल
    गाँधीवादी अपनाओगे।
    तब तब धुश्मन के हाँथो से
    थप्पड़ खाते जाओगे।।

    सत्य अहिंसा क्या होती है
    मर्यादा को भूल गये।
    गाँधीवादी राह पकड़ ली
    प्रभु राम को भूल गये।।

    भूल गये तुम सत्य अहिंसा
    भारत की परिपाटी है।
    लेकिन रण मे पीठ दिखाना
    कायरता कहलाती है।।

    क्षमा सत्य उसके खातिर
    जो मानवता का रक्षक हो।
    उसके खातिर वध निश्चित है
    जो मानवता का भक्षक हो।।

    अधिक क्षमा करना भी निज मे
    कायरता कहलाती है।
    अधिक अहिंसा का पालन
    निज प्रत्याघात कराती है।।

    स्वाभिमान के खातिर अहि मे
    बिष का भान जरूरी है।
    दुष्ट दलन के खातिर फिर अब
    दंण्ड विधान जरूरी है।।

    याद करो गीता की वाणी
    जो केशव ने गायी थी।
    याद करो प्रभु राम गर्जना
    जो सागर को समझाई थी।।

    हे भारत के पार्थ आज तुम
    महाभारत को भूले हो।
    इसीलिये बलिदान हुए सर
    और शर्म से झूले हो।।

    समय नही है सीमा पे अब
    श्वेत कपोत उड़ाने का ।
    न ही रंग गुलाबी लेकर
    फागुन गीत सुनाने का।।

    भारत माँ के अमर पुत्र
    गांण्डीव उठा टंकार करो।
    शांति यज्ञ की पूजा छोड़ो
    दुश्मन पर अब वार करो।।

    छप्पन इंची सीना वाले
    उठो नया हुंकार भरो।
    सीमाओ पर तोपें दागो
    आर करो या पार करो।।

    जय हिंद जय भारत
    आपका ——–अखिलेन्द्र तिवरी (कवि)
    sri raghukul vidya peeth civil line gonda
    uttar pradesh
    तुलसी जन्मभूमि राजापुर गोण्डा (उत्तर प्रदेश)

    ✋✋✋✋माँ का आशीर्वाद✋✋✋✋✋✋✋

  • Swach bharat banyenge

    गांधी जी का सपना सच करके हम दिखाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    साफ-सुथरी गलियां होगी साफ सुथरा होगा गांव
    साफ सफाई करने में कभी ना रुकेंगे हमारे पांव
    हमने वादा कर लिया है वादा हम यह निभाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    गांधी जी का सपना सच करके हम दिखाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    घर का कचरा गली का कचरा कूड़ेदान में डालेंगे
    गांव से लेकर शहर तक नियम हम यह पा लेंगे
    कचरा ना डालेंगे सड़क पर ना गंदगी फैलाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    गांधी जी का सपना सच करके हम दिखाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    देश हमारा घर है यारों देश को स्वच्छ बनाना है
    स्वच्छ भारत का सपना हमें दिल में बसाना है
    स्वच्छ भारत की ज्वाला” संगम” हम ना कभी बुझाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

    गांधी जी का सपना सच करके हम दिखाएंगे
    अपने भारत को हम स्वच्छ भारत बनाएंगे

  • प्राण से प्यारे गणतंत्र

    प्राण से प्यारे गणतंत्र,
    पल पल कोटि कोटि प्रणाम।

    “**फूली नहीं समाती,**
    छब्बीस जनवरी।
    खुशियों के गीत गाती
    छब्बीस जनवरी ।

    गांधी भगत बिस्मिल ,
    आजाद बोस की,
    कुर्बानियाँ सुनाती ,
    छब्बीस जनवरी ।

    रक्षा करने स्वदेश की ,
    हँसते हँसते सर्वस्व लुटाते हैं ।
    उन अमर शहीदों को ,
    स्वदेशवासी श्रद्धानत होकर शीष झुकाते हैं।

    देशवासियों को शुभकामनाएँ, बधाइयाँ।

    सविनय,
    आप सभी का मित्र
    जानकी प्रसाद विवश

  • जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

    वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं
    लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं

    भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये
    माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटे

    बिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी
    प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाई

    ब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है
    बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक है

    मंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन को वर्जित था
    ईश्वर था उच्च जातियों का, सब पुण्य उन्हीं को हासिल था

    बेकार अगर हो जाय अंग, मानव ताकत घट जाती है
    सब लोग दबा सकते उसको, आबरू मान छिन जाती है

    भारतजन का एक बड़ा भाग, हमने ही निष्क्रिय कर डाला
    शक्तिहीन बना इनको हमने, कमजोर देश को कर डाला

    हर वर्ग धर्म में फूट डाल, दंगे फ़साद करवाते थे
    राजा राजा जनता राजा, हिन्दू मुस्लिम लड़वाते थे

    आपस में जब फूट पड़ी, अंग्रेजों कि बन आई थी
    आज़ादी कैसे मिल सकती, आपस में ठनी लड़ाई थी

    कुछ रजवाड़े कुछ नेतागड़, गोरों के सिपहसलार बने
    कुछ राय बहादुर सर की ताज, बने गोरों के सच्चे बन्दे

    अन्न, कपास जूट लोहा, भर भर जहाज़ ले जाते थे
    हर साल नया लंदन बनता, हर साल स्वर्ग बन जाते थे

    कंगाल हो गया देव भूमि, लाखों भूखे नंगे फिरते
    हर साल पड़े बंगला अकाल, हर साल हज़ारों जरे मरे

    यह देश हमारा अपना था, सब चीज़ यहाँ कि उनकी थी
    अंग्रेज़ हमारे स्वामी थे, बेड़ियाँ पैर में जकड़ी थी

    कानून न्याय सब उनका था, हम बने मूक दर्शक केवल
    लाखों बिस्मिल आज़ाद मरे, हम मौन रो रहे थे केवल

    देवभूमि उद्धार हेतु, गांधी का अवतार हुआ
    भारत जननी स्वर्ण भूमि में, नया रक्त संचार हुआ

    सत्य अहिंसा निर्भयता की, बचपन में शिक्षा पाई
    मानव सेवा सर्वशेष्ठ धर्म, माता ने यही सिखाई थी

    इंग्लैंड गये शिक्षा लेने, आज़ाद मुल्क की हवा मिली
    आज़ादी है अनमोल रत्न, जौहरी हृदय को भनक लगी

    भाषण लिखने पढ़ने की, गोरे केवल अधिकारी थे
    पेशा चुनने धन रखने की, केवल वे ही अधिकारी थे

    काले हिन्दुस्तानी कुत्ते, दोनों ही एक बराबर थे
    होटल गिरजा में जाने से, भारतवासी वर्जित थे

    गोरे काले का भेद देखकर, गाँधी का दिल भर आया
    आज़ादी है एकमात्र लक्ष्य, दिल में यह बात उभर आया

    भारत आकर देख दुर्दशा देश की गाँधी रोया
    कैसे टूटे लौह बेड़ियाँ, इस विचार में खोया

    सत्य अहिंसा जन क्रांति का, मार्ग श्रेष्ठ व उत्तम है
    मात्रभूमि की मुक्ति अर्थ, बस मार्ग यही सर्वोत्तम है

    सत्य अहिंसा शस्त्र ग्रहण कर, आज़ादी रण में कूद पड़ा
    आज़ादी का शंख फूंककर, भारत छोड़ो आवाज़ दिया

    लार्ड ह्यूम की कांग्रेस, निर्जीव शक्ति से हीन बनी
    कर्मठ नीतिज्ञ नेता अभाववश, जन जन मन से दूर हटी

    गाँधी का नेतृत्व मिला तो, प्राण शक्ति संचार हुआ
    एक नयी शक्ति एक नया जोश, ले कांग्रेस तैयार हुआ

    तैयार हुआ संघर्ष हेतु, अन्याय गुलामी के विरुद्ध
    जन जन में जागृति लाने को, चल पड़े कांग्रेसी विश्रुब्ध

    झंडा कांग्रेस नीचे, हर वर्ग किस्म के लोग जुटे
    जंजीर गुलामी तोड़ेंगे, लाखों हज़ार कंठ स्वर फूटे

    नेताजी नेहरु पटेल, राजेन्द्र रत्न अब्दुल कलाम
    अम्बेडकर राजा जयप्रकाश, चल पड़े तिरंगा हाथ थाम

    धनवान पुत्र वनिता छोड़े, सब मोह नेह से मुँह मोड़े
    आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े फकीरी वेश धरे

    एक नयी चेतना नयी लहर, जन जन में भर आयी थी
    उठ खड़ा हुआ सम्पूर्ण देश, आज़ादी की लिप्सा जागी

    चल पड़ा देश गाँधी पीछे, सब छोड़ मोह माया धन जन
    भर गये जेल अंग्रेजों के, अभिमान मान उनके टूटे

    गाँधी की आवाज़ राह पर, जत्थे के जत्थे निकल पड़े
    निज माथ हथेली पर रक्खे, शत शत सहस्त्र इन्सान चले

    चल पड़े छोड़ रोते बच्चे, कोई सुहाग की रात तजे
    बूढ़े माँ बाप छोड़ कोई, कोई धन राज्य मान छोड़े

    माता बहनों कि फौज़ देख, चल पड़ी पोंछ सिन्दूर माथ
    मातृभूमि को मुक्त कराने, चल पड़ी नारियों की बरात

    निकल पड़े नवयुवक छोड़, कॉलेज पढ़ाई सब अपनी
    आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े नवयुवक नवयुवती

    छोड़ वकालत कोर्ट चला, कानून पंडितों का जत्था
    भूखे नंगे श्रमिकों का, निकल पड़ा पैदल जत्था

    छोड़ किसानी चले भूमिधर, व्यापारी व्यापार छोड़ कर
    आजादी का दीप जलाने, चले सिपाही कफ़न बांध कर

    मंदिर मस्जिद गुरुदारे, बन गये सभा स्थल सारे
    आज़ादी की प्रतिमा को, हर रोज़ पूजते जन सारे

    हर रोज़ हजारों आते थे, संदेश सुनाये जाते थे
    हर गाँव गली में जाकर के, सब लोगों तक पहुँचाते थे

    देश में निर्मित अपनी चीज़े ही, भारतवासी अपनाओ
    अगर रोकनी ब्रिटिश लूट है, भाई भाव स्वदेशी लाओ

    बहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, मोह विदेशी छोड़ो
    ब्रिटिश माल की होली फूंको, कानून ब्रिटिश की तोड़ो

    माल विदेशी की होली, हर गाँव गली में खूब जली
    ब्रिटिश किताबें कपड़े लत्ते, गोरों की सम्मान जली

    बहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, लोग स्वदेशी अपनाये
    हर घर में चरखा चलता था, घर घर वस्त्र बनाते थे

    जूट कपास चाय कहवा, ब्रिटिश मिलों कि जननी थी
    अंग्रेज़ व्यापारी को हमने, इनकार किया इनको देनी

    ब्रिटिश मिलें हो चलीं बंद, लंदन में हाहाकार मचा
    चरखा करघा पर रोक लगे, लंदन में आवाज़ उठा

    ब्रिटिश मिलें हो जाय बंद, यह उनको नहीं गँवारा था
    खो जाय हाथ से पारसमणी, हरगिज़ यह नहीं गंवारा था

    भारत जन के इन कामों से, गोरे शासक थे घबराये
    सदियों से दबी जातियों का, उठना कैसे उनको भाये

    हर रोज़ हजारों चले जेल, हर रोज़ गोलियाँ चलती थी
    हर रोज़ सैकड़ों विधवा हों, हर रोज़ चितायें जलती थीं

    जलियाना का बाग़ देख,कुर्बान सैंकड़ों हुए जहाँ
    जनरल डायर की गोली से, सिन्दूर हजारों मिटे जहाँ

    खून का हर कतरा कतरा, हर चोट जिस्म पर पड़ा हुआ
    गोरी शासन कि नींव ईट, हर रोज़ हिला खोखला करता

    ज्यों ज्यों अत्याचार बढ़े, चिनगारी जोर पकड़ती थी
    लाखों शहीद कुर्बान हुए, पर आग लगी न बुझती थी

    एक ओर खड़े थे शांति वीर, एक ओर क्रांति मतवाले थे
    एक ओर अहिंसा के सेवक, एक ओर खून के प्यासे थे

    आज़ाद भगत सिंह बिस्मिल ने, एक लहर क्रांति की फैलायी
    आजादी मस्तक माँग रही, आवाज़ देश भर में छायी

    बम फेंक अंग्रेजी संसद में, इन्क़लाब भगत सिंह चिल्लाया
    सोती जनता की नींद तोड़, गोरी शासन को झकझोरा

    पंजाब के कोने कोने में, इक आग लाजपत ने फूंका
    आजादी की समर भूमि में, वह वीर निडर होकर जूझा

    बलिदान हो गया देश अर्थ, बर्बर शासक के हाथों से
    यह खून व्यर्थ नहीं जायेगा, आवाज़ उठी हर बूंदों से

    भगत सिंह सुखदेव गुरु, हँसते फांसी पर झूल गये
    जय जननी जय कर्मभूमि, जपते आज़ाद कुर्बान हुए

    देश पर मरने वालों का, बलिदान रंग लेकर आया
    अन्यायी शासन के विरुद्ध, जेहाद देश भर में छाया

    आज़ादी के रंग मंच पर, गाँधी सुभाष दो नायक थे
    सत्य अहिंसा जन क्रांति के, दोनों की सच्चे साधक थे

    लाहौर कांग्रेस सम्मेलन से, दोनों नेता दो राह चले
    सुभाष क्रांति की राह पकड़, कांग्रेस से मुहँ मोड़े

    ब्रिटिश राज की गिद्ध दृष्टि से, कब तक सुभाष बच सकते थे
    शासन की खोजी आखों से, कब तक सुभाष छिप सकते थे

    पड़ गयी बेड़ियाँ हाथों में, निज घर में बंदी बन बैठे
    ब्रिटिश फौज़ के घेरे में, सन्यासी का रूप धरे

    वह शेर नहीं था जंगल का, जो लौह सींखचों में रहता
    वह तो ऐसा अंगारा था, जो नीचे राख नहीं दबता

    ब्रिटिश कैद से निकल पड़े, सब तोड़ गुलामी के बंधन
    आज़ादी के हवन कुंड में, चल पड़े जलाने अपना तन

    सिंगापुर रंगून पहुँच, “आज़ाद हिन्द” का गठन किया
    खून के बदले आज़ादी, जन जन को आवाज़ दिया

    बन गये सिपाही लाखों जन, लाखों ने धन का दान किया
    मातृभूमि के चरणों में, लाखों ने जीवनदान दिया

    सिंगापुर, इटली जापान गये, हिन्दुस्तानी मित्रों से मिलने
    नापाक ब्रिटिश शासन विरुद्ध, हथियार समर्थन धन लेने

    हथियार समर्थन धन लेकर, सेना का विस्तार किया
    ब्रिटिश दैत्य से भिड़ने को, “आज़ाद हिन्द” तैयार हुआ

    हे वीर पुत्र भारत माँ के, आज़ादी तुम्हें पुकार रही है
    हिम आलय है बाट देखता, दिल्ली तुम्हें निहार रही है

    गूंज उठा जय हिन्द हिन्द, सर कफ़न बाँध फौजी निकले
    ब्रिटिश हुकुमत थर्रायी, जब आज़ाद हिन्द पलटन निकले

    अंडमान निकोबार द्वीप, “काला पानी” कहलाते थे
    आज़ादी के दीवानों के, बंदीगृह समझे जाते थे

    विहँस पड़ी उस समय भूमि, जब झंडा सुभाष ने फ़हराया
    रो पड़ा सिंह समकक्ष देख, बंदी वीरों की कृष काया

    ब्रिटिश दासता के प्रतीक, उन द्वीपों के नव नाम दिये
    आज़ादी पा जो हर्षित थे, ‘स्वराज्य’ ‘शहीद’ वे कहलाये

    नागालैंड तरफ बढ़ गया वीर, सदियों से दास बना जो था
    आज़ाद हिन्द गोरी फौजों का, वह प्रांत बना रणस्थल था

    ललकार उठा वह मस्त सिंह, वीरों जय शीश मांगती है
    देखो आज़ादी प्यासी है, वह खून खून चिल्लाती है

    बढ़ गए वीर तन मोह छोड़, छोड़े प्रिय जन घर माया
    कुर्बान हुये जननी खातिर, संपूर्ण जगत में यश छाया

    वह महायुद्ध की बेला थी, हो गया पराजित जर्मन था
    इटली जापान मर चुके थे, विजयी इंग्लैंड मुदित मन था

    हाथ दाहिना टूट गया, जब हार गये जापानी
    अभाग्य देश का सचमुच था, जय ‘आज़ाद हिन्द’ को मिली नहीं

    जन जन के नेता गाँधी यदि, असहयोग क्रांति को फैलाते
    वीरवर सुभाष के युद्ध यज्ञ में, थोड़ा भी खून गिरा पाते

    उस समय अन्य स्थिति होती, आज़ाद देश हो सकता था
    सदियों से बना गुलाम देश, आज़ाद हवा ले सकता था

    हार गया आज़ाद हिन्द, भाग्य देश अपना हारा
    सो गया देश का पारसमणि , जो बना देश का प्यारा था

    बुझ गयी विश्वयुद्ध कि लपटें, नव निर्माणों की बेला थी
    पर भारत में सत्य अहिंसा, क्रांति युद्ध की बेला थी

    इस नयी क्रांति की ज्वाला को, रे कौन बुझा सकता था
    सदियों से सोयी जाति जगी, रे कौन कुचल सकता था

    थका हुआ बूढा ब्रिटेन, कमजोर शक्ति से हीन बना
    अमरीका कम्युनिस्ट रूस, दो नयी शक्ति से दीन बना

    गोलमेज़ कांफ्रेंस चला, आज़ादी की बात चली
    दिन गुजरे हफ्तों गुजरे, पश्चात देश की भाग्य जगी

    ब्रिटेन उस समय शासित था, लेबर के लार्ड ऐटली से
    कुछ सहानुभूति जो रखता था, गुलाम देश व दलितों से

    आज़ादी से वंचित रखना, ब्रिटेन के वश की बात न थी
    पर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई, में नफरत की बीजें बोयी

    जिन्ना साहब मुस्लिम लीगी, आज़ादी के इक नायक थे
    अंग्रेजी शासन के खिलाफ, इंसान सही माने में थे

    ब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, स्वयं जिन्ना साहब फंस बैठे
    मजहब धर्म की आंधी में, दो देश समर्थक बन बैठे

    हिन्दू मुस्लिम में आग लगी, बन गये खून के प्यासे थे
    जो कल तक भाई होते थे, बन गये आज दुश्मन पक्के

    हर साल रंग की होली थी, इस साल खून से हम खेले
    हर साल प्यार की खुशबू थी, इस साल घृणा के मेले थे

    आज़ादी की या सत्ता की, नेताओं में जो जल्दी थी
    ब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, फंसने की उनको जल्दी थी

    सब शर्त मान अंग्रजों का, आज़ादी हमने हासिल की
    जो भूमि गुलामी में जुड़ी रही, वह आज़ादी में टूट गयी

    सैंतालिस का पन्द्रह अगस्त, खुशियों का सागर लाया
    एक तरफ हजारों जीवन में, दुःख का मातम छाया

    लाखों हज़ार घर उजड़ गये, चहुँ ओर भीड़ थी दुखियों की
    जन जन के प्रिय गाँधी के लिए, वह समय नहीं था खुशियों की

    जिन आदर्शो के खातिर, जीवन भर संग्राम किया
    दब गये घृणा आंसू नीचे, सब बापू का अरमान मिटा

  • कविता — व्यक्ति–विशेष

    बंधु !

    आज स्व. राजीव गांधी की पुण्य—तिथि है।

    एक सपना और उसमें समाहित लालसा का स्मरण दिवस।

    हार्दिक श्रुद्धांजलि के साथ

    एक व्यक्ति — दो भाव

     

    कविता – 01   

    व्यक्ति—विशेष

    || स्वप्नभंग ||

    : अनुपम त्रिपाठी

    तब;

    जबकि,

    एक समूची पीढ़ी

    निस्तेज़ कर दी गई

     

    कोई नहीं; देख सका ………..

    उन सपनों को, जो समाए थे

    : इक्कीसवीं सदी के लिए !

     

    काश !

    कोई तो होता !!

    वहीं–कहीं; आस—पास

    (जहां लहूलुहान थी धरा और क्षत—विक्षत लाश)

    जो; समेट सकता

    हिंसा का विलाप

     

    फ़िर;

    उकेरता

    ‘कबूतर के पंख पर’

    ताज़ा रक्त से

    अहिंसा के स्वर

    #anupamtripathi  #anupamtripathiK

    ************_____**************

     

     

     

     

    कविता – 02   

    व्यक्ति—विशेष

    || एक अबूझ प्यास ||

    : अनुपम त्रिपाठी

     

    एक व्यक्ति; जो फेंटता रहा  : सेना

    “ताश के पत्तों सरीखा”

    जिसने; ‘अहिंसा’ को ‘शतरंज’ की तरह खेला

    और; जुटाता रहा ‘मेला’

     

    शक्ति थी उसके पास —– अनुभव के नाम पर

    गौरवशाली वंश—परंपरा —– सत्ता की दुकान पर

     

    जलता पंजाब ………. पिघला न सका जिसे

    कराहता नागालेंड ……… रुला न सका जिसे

     

    बुल्लेट—प्रूफ़ ‘जैकेट’ पहने

    जो; मिलता रहा : निहत्थी जनता से

     

    वही व्यक्ति !

    पिघलने लगा : “पराई आग में”

    : अंतर्राष्ट्रीय छबि की लालसा !

    या कि; ‘नोबल’ की चाह में  !!

    #anupamtripathi  #anupamtripathiK

    *************_______*************

    21—05—2017

    **************

     

     

     

     

     

     

     

  • शहीदी

    कुछ मेरी औकात नहीं , कि तुझ पर कलाम चलाऊं मैं

    कुर्बानी तेरी करे बयां , वो शब्द कहाँ से लाऊं मैं

    नाम तेरा लेने से पहले पलकों को झपकाउं मैं

    भूल गए जिन पन्नो को हर्फ़ों से आज सजाऊँ मैं

    जब भारत माँ का आँचल लगा चीर-चीर होने

    गोरे बसने आये जैसे नागिन आयी हो डसने

    जब भारत का सूरज भी त्राहिमाम चीखा था

    तब खटकड़ में एक सिंहनी की कोख से सूरज चमका था

    भारत माँ बोली कि मैं गद्दारों पर शर्मिंदा हूँ

    चीख पड़ा सरदार माँ अभी तलक मैं जिन्दा हूँ

    अंग्रेजों को घाट घाट का पानी उसने पिला दिया

    अंग्रेजी सत्ता का तख़्त-ओ -ताज पूरा हिला दिया

    आजादी के हवन कुंड में वो तो अग्निचेतन था

    अंग्रजों के सीने का तीरों के जैसे भेदन था

    तुझे गले लगा कर तो वो फांसी भी रोई होगी

    झूलते देख लाडला फांसी, धरती की चुनर धानी रोई होगी

    रोया होगा इंकलाब का भी वो बासंती चोला

    चूमा जब फांसी को तूने अम्बर भी होगा डोला

    तड़प गयी होंगी लहरे सागर भी रोया होगा

    फांसी वाले आँगन का पत्थर पत्थर रोया होगा

    दूर कही अम्बर में तारा भी टूटा होगा

    आँखों में जब तेरी खून का लावा फूटा होगा

    तूने आजादी के मंदिर की बुनियाद खड़ी की थी

    इंकलाब की बलीदेवी पर अपनी शाख बड़ी की थी

    तेरी कुर्बानी का अब ये क्या अहसान चुकाएंगे

    गांधीजी के बन्दर है बस कुर्सी कुर्सी चिल्लायेंगे

    याद तूम्हे नवम्बर 14 , नहीं भूले 2 अक्टूबर को

    30 जनवरी याद रही , पर भूले भारत के बेटों को

    23 मार्च को याद जरा उन शहीदों को भी कर लो

    आँखों में भर लो पानी और सीने से चिंगारी उगलो ।।

    तेरी पूजा में तो बस मैं इतना ही कह सकता हूँ

    तेरी छोटी आयु को सदियों से लंबी कह सकता हूँ

    शत शत बार नमन है तुझको तेरी जवानी को

    बार बार दोहरायेगा इतिहास तेरी कहानी को ।।

     

  • शहीद

    कुछ मेरी औकात नहीं , कि तुझ पर कलाम चलाऊं मैं

    कुर्बानी तेरी करे बयां , वो शब्द कहाँ से लाऊं मैं

    नाम तेरा लेने से पहले पलकों को झपकाउं मैं

    भूल गए जिन पन्नो को हर्फ़ों से आज सजाऊँ मैं

    जब भारत माँ का आँचल लगा चीर-चीर होने

    गोरे बसने आये जैसे नागिन आयी हो डसने

    जब भारत का सूरज भी त्राहिमाम चीखा था

    तब खटकड़ में एक सिंहनी की कोख से सूरज चमका था

    भारत माँ बोली कि मैं गद्दारों पर शर्मिंदा हूँ

    चीख पड़ा सरदार माँ अभी तलक मैं जिन्दा हूँ

    अंग्रेजों को घाट घाट का पानी उसने पिला दिया

    अंग्रेजी सत्ता का तख़्त-ओ -ताज पूरा हिला दिया

    आजादी के हवन कुंड में वो तो अग्निचेतन था

    अंग्रजों के सीने का तीरों के जैसे भेदन था

    तुझे गले लगा कर तो वो फांसी भी रोई होगी

    झूलते देख लाडला फांसी, धरती की चुनर धानी रोई होगी

    रोया होगा इंकलाब का भी वो बासंती चोला

    चूमा जब फांसी को तूने अम्बर भी होगा डोला

    तड़प गयी होंगी लहरे सागर भी रोया होगा

    फांसी वाले आँगन का पत्थर पत्थर रोया होगा

    दूर कही अम्बर में तारा भी टूटा होगा

    आँखों में जब तेरी खून का लावा फूटा होगा

    तूने आजादी के मंदिर की बुनियाद खड़ी की थी

    इंकलाब की बलीदेवी पर अपनी शाख बड़ी की थी

    तेरी कुर्बानी का अब ये क्या अहसान चुकाएंगे

    गांधीजी के बन्दर है बस कुर्सी कुर्सी चिल्लायेंगे

    याद तूम्हे नवम्बर 14 , नहीं भूले 2 अक्टूबर को

    30 जनवरी याद रही , पर भूले भारत के बेटों को

    23 मार्च को याद जरा उन शहीदों को भी कर लो

    आँख में भर लो पानी और सीने से चिंगारी उगलो ।।

     

  • उठो वीर जवानो

    उठो वीर जवानो भारत माता,

    तुम्हे पुकार रही,

    अपने लालों के लहू का,

    बदला माँग रही,

    अपने अमर जवानो के पथ पर,

    चलने को ललकार रही,

    उठो वीर जवानो भारत माता,

    तुम्हे पुकार रही,

    आज फिर भारत माता ,

    पर आघात हुआ,

    देश के हुकूमरानो की,

    विफलता का आभास हुआ,

    आतंक और दंगा अब आम हुआ,

    उठो वीर जवानो भारत माता,

    तुम्हे पुकार रही,

    चण्ड बनो,दबंग बनो,

    साहस और उमंग भरो,

    देश के गद्दारों का,आतंकियो का,

    हत्यारों का दम्भ तुम भंग करो,

    भारत माता के सपूत तुम,

    आज़ाद,भगत सिंह, सुभाष बनो,

    गाँधी का विश्वास बनो,

    पटेल की आस बनो,

    उठो वीर जवानो भारत माता,

    तुम्हे पुकार रही,

    जन-जन से अपने लालों के,

    लहू का बदला माँग रही ।।

  • नौकरशाही आस्था

    ये कैसी है आस्था, जिसमे समाई नौकरशाही |

    ये कैसी है व्यथा, जिसे सुन कर मन डगमगाई ||
    ये कैसी है अखंडता, जिसमे धर्मनिरपेक्षता की नींव मरमराई |
    ये कैसी है अटूटता, जिसमे भ्रमता की नक्काशी समाई ||

    वो कौन सी है व्याख्या, जिसे सुनाकर हुए हैं विख्यात |
    वो कौन सी है अदा, जिसे प्रदर्शित कर करते हैं आयात ||
    वो कौन सा है व्यवसाय, जिसमे पाते हैं लाभ अकस्मात |
    वो कौन सा है पाप, जो धुलता है करने के पश्चात ||

    किस शासन प्रणाली को मानते हो तुम |
    राज्य के अंदर राज्य बना बैठे हो तुम ||
    किसने दिया माप की इकाई परिवर्तन करने का अधिकार |
    गाँधी छोड़ उनके नाम के सिक्के, ठप्पों का प्रचार ||

    अधर्म लक्षणो का प्रदाफ़ाश होता है सबका ख्याल |
    फिर क्यों बनते है लोग उनकी सेना और ढाल ||
    हे मानस, ना तेरे राम, ना श्याम है दिखते |
    सारे के सारे, तेरे बाज़ार में है बिकते ||

    फिर किससे ये प्रेम, किसका है डर |
    उल्लेखनीय बातों पर ना कर तू फिकर ||
    सबको पाप-पुण्य का होता है पूर्ण ज्ञात |
    प्रायश्चित के लिए क्यों बनते हैं अज्ञात ||

    अगर तू मानता है धरा पर है तेरा भगवान |
    तो तू भी उस माटी का बना, वो भी, सारे गुण हैं समान |
    फिर क्यों भेजता है उसके द्वारा अपनी पहचान ||
    क्या तेरा भगवान सिर्फ़ पुजारियों को है दर्शन देता |
    अपने भक्तजन की गुज़ारिश सिर्फ़ उसी से है लेता ||

    हे प्रिय, तुम्हारे चाहने वालों का वास्ता |
    अभी भी वक्त है बदलो अपना रास्ता….||

    –       सोनू कुमार

  • आजादी

    आजादी

    स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये।

    गुलामी में भी हमारे दिल में देश की शान काफी थी,

    तोड़ देते थे होंसला अंग्रेजो का हममे जान काफी थी,

    पहनते थे कुर्ता और पाजामा खादी की पहचान काफी थी,

    गांधी जी के मजबूत इरादों की मुस्कान काफी थी,

    आजाद भारत देश को स्वतंत्र भाषा विचार को,

    लड़ कर मर मिट जाने की तैयार फ़ौज काफी थी,

    गुलामी की जंजीरों से जकड़े रहे हर वीर में,

    स्वतंत्र भारत माँ को देखने की तस्वीर काफी थी॥

    राही (अंजाना)

  • हम सबका हिंदुस्तान

    इस देश में अजीब किस्म की बात चल रही है,
    हिन्दू , मुस्लिम ,सिख ,ईसाई कहने को है सब भाई-भाई
    ख़ास तौर पर हिन्दू और मुस्लिमान
    इस कविता में न कोई ऐसा नाम हैं जो हिन्दू या मुसलमान हैं , बल्कि एक हिंदुस्तान हैं

    सदियों लंबा इतिहास है ये , सारे देशों में ख़ास हैं ये
    दुनिया कहती है क्या चीज़ हैं ये , गंगा , जमुना तहज़ीब है ये
    ये देश शिवा,राणा का हैं ; यह देश महाराणा का हैं

    जय हो , अशोक , महावीर , विक्रमादित्य सम्राट की
    यह बुद्ध , आदिशंकर नाथ की

    यह पृथ्वीराज चौहान का हैं , हैदर , टीपू सुल्तान का हैं !
    यही यशोधा ने कृष्णा को पाला हैं , यही का सुभाष मतवाला हैं

    यही झाँसी की रानी हैं , यही का भगतसिंह बलिदानी है
    एक जोश , एक सेलाब हैं ये ; अब्दुल कलाम का ख्वाब हैं ये !

    ये देश रफी के गानो , ये देशः लाता के तालो का
    ज़ख़ीर हुसैन के थापों का , किशोर कुमार के रागों का

    दुनिया को दी है सरगम की देन , यही का हमारा तान सैन!
    सारे संसार के गीत हैं ये हमारा जगजीत है ये!
    ये तुलसी और कालिदास; गीतों ग़ज़लों की मीठास

    यही हैं ग़ालिब की ग़ज़ल
    यही है चलता किसान अपना हल
    यही वो इतराता हुआ ताजमहल

    यह लाल किला , यह क़ुतुब मीनार ,
    अजन्ता एलोरा की पुकार

    यही बेकहोफ रूहानी मस्ती हैं
    यही का मोहिनुद्दीन चिश्ती हैं !

    भाई चारा आंदन हैं है यहाँ
    हमारे प्यारे विवेकानंद हैं यहाँ

    यह कपिल, सचिन, गावस्कर हैं
    सानिया , अभिनव हैं यहाँ
    उषा मिल्खा की दौड़ हैं यहाँ

    यहा मीणा हैं , मधुबाला हैं;
    नरगिस वैजंतीमाला हैं

    अमिताभ , और सलाम हैं यहा
    शाहरुख़ और आमिर खान है यहा

    यहा साधू संतो की भाषा हैं
    संबंधित की परिभाषा हैं

    गाँधी का अमर विचार हैं ये
    टैगोर ,तिलक का प्यार है ये

    ये भगवा और हरा भी है
    रंगों से भरा भरा भी है

    ये भजन और कवाली हैं
    यहा ईद और दिवाली है

    रोज़ा,करवाचौथ , रमज़ान हैं ये
    गीता और कुरान है ये
    कर्त्तव्य और ईमान हैं ये
    दोनों का हिंदुस्तान हैं ये हम सब का हिंदुस्तान हैं ये

  • स्वतन्त्रता की कहानी

    स्वतन्त्रता की कहानी

    गुलामी में भी हमारे दिल में देश की शान काफी थी,

    तोड़ देते थे होंसला अंग्रेजो का हममे जान काफी थी,

    पहनते थे कुर्ता और पाजामा खादी की पहचान काफी थी,

    गांधी जी के मजबूत इरादों की मुस्कान काफी थी,

    आजाद भारत देश को स्वतंत्र भाषा विचार को,

    लड़ कर मर मिट जाने की तैयार फ़ौज काफी थी,

    गुलामी की जंजीरों से जकड़े रहे हर वीर में,

    स्वतंत्र भारत माँ को देखने की तस्वीर काफी थी॥

    राही (अंजाना)

  • स्वतंत्रता दिवस

    पंद्रह अगस्त का पावन दिन , वीरों की याद दिलाता है |
    शहीद हुए जो देश के खातिर , उनकी कथा सुनाता है |
    तेरह वर्ष की उम्र में आकर , चौदह कोड़े थे खाये |
    भारत माँ के लिए लड़े और , आजाद चन्द्र शेखर कहलाये |
    गांधी ,सुभाष, बिस्मिल, रोशन ने , देश के खातिर प्राण दिये |
    भारत की आजादी के हित , सारे सुख थे त्याग दिये |
    लाल ,बाल और पाल ने मिलकर , आजादी का बिगुल बजाया |
    लक्ष्मी, तात्या तोपें ने था , विद्रोह का स्वर गरमाया |
    पूरब से लेकर पश्चिम तक , उत्तर से लेकर दक्खिन तक |
    हर बच्चे के मन भभक उठी , आजादी की ज्वाला धधक उठी |
    फिर भारत माँ की लाज बचाने , भारत का हर बच्चा आया |
    लड़ता रहा साँस थी जब तक , दुश्मन को था मजा चखाया |
    अरि के चंगुल से हमने तब , भारत को आजाद कराया |
    लाल किले के ऊपर हमने , यह भव्य तिरंगा लहराया |
    भारत के हर प्राणी को , आज कसम यह खाना है |
    पंकज प्राण भले ही जायँ, पर झंडे को लहराना है |
    आदेश कुमार पंकज

  • हमारा हिंदुस्तान ….. बक़ौल; मेरा देश महान !

    यह हिन्दुस्तान है ………………………………………..
    कहना आसान — समझना मुश्किल — सहेजना असंभव
    फिर भी हमें ये गुमान है
    गांधी का अरमान है — सपनों का जहान है
    ————-मेरा देश महान है————–
    ……………….. क्या, यही ‘वो’ हिन्दुस्तान है ?

    ज्वालामुखी हर सीने में, हर आंख से रिसता लावा ,
    हर मंदिर—मस्ज़िद–गिरिजा पर, धर्मान्धता का धावा ,
    चारों ओर ….पोर–पोर….आक्रोश का सैलाब बह रहा है
    देखिए ! ग़ौर कीजिए,…….‘आस्था का महल’ ढह रहा है.

    सिमटी आस्थायें —- बिखरा विश्वास,
    कुटिल वार्तायें —- गुमशुदा अहसास,
    लहू और फ़रेब से लिखा गया : इतिहास,
    आंसूओं से तर — ब — तर : वर्तमान
    आशंका से जूझता : भविष्य
    बस , यही तो ‘शेष’ पहचान है
    : ये कैसा भारत महान है ?
    क्या : यही ‘वो’ हिन्दुस्तान है ??

    लोकतंत्र की गाय ‘भूख’ से मर रही है,
    बे–लगाम व्यवस्था, शान से ‘चारा’ ‘चर’ रही है.

    बेकाम हाथ—खाली पेट—-सूनी आंखें,
    सारी जनता सहमी है, सच कहने से डर रही है,
    : विकास की सदी, अविश्वास के दौर से गुज़र रही है.

    ‘सत्ता का धृतराष्ट्र’, फेंकता है : नोट ,
    ‘दलालों का शकुनी’, बटोरता है : वोट ,
    बिकता है लाचार मतदाता———-
    ग्राम्यदेवता — भारत भाग्य विधाता.

    ‘ वे ’ गिध्द की तरह मंडराते हैं,
    हमें नोंचते ………….. डराते हैं,
    क्योंकि , हमारे पास ‘थाली’ है, उनकी ‘भूख’ निराली है,
    हमें “रोटी की तलाश” है, ———————–
    उनके लिए “लोकतंत्र; एक ज़िंदा—लाश” है,
    आईए ! आप भी आईए, जितना छीन सकें : खाईए,
    : सामूहिक भोज का आयोजन् है,
    : जनतंत्र का यही तो प्रयोजन् है .

    मुझे खेद है ……………………….,
    आपको भी होगा, शायद !
    विगत् अर्द्ध–शती में, हमें ये कैसा भारत मिला ?
    यहां की प्यासी–दूषित् नदियां —– रेतीली मांग सजाए ,
    : सपने बहाती हैं
    बीमार नहरें —- सूखे खेतों में —- आंसू भर जाती हैं.
    किसान, लालटेन लटकाए, बिजली को खोजते हैं,
    खेतों में धान की जगह, ‘कुकुरमुत्ते’ रोपते हैं.

    साज़िश और शिक़स्त, अंतर्कलह से ग्रस्त ,
    सदमा या सहानुभूति, भयजनित् प्रीति
    : इसे ही कहते हैं, ज़नाब !
    बिना शर्त समर्थन् की राजनीति.

    हर कटते दरख्त के साए में एक मज़हब पनपता है ,
    हर मज़हब का बन जाता है, एक नया दल,
    हर दल में भीषण ‘दल—दल’ सने ‘सफे़दपोश’ नेता,
    हर नेता की अबूझ——महत्वाकांक्षा का ‘महल’
    ‘ हरम के हरामियों’ की तरह, ये कुटिल खेल में व्यस्त हैं
    ‘ गठबंधन की मुस्कुराती हुई राजनीति’ में
    पारंगत् हैं ————————–अभ्यस्त हैं .

    किसे चिंता है , ……. : संविधान मात्र एक पुलिन्दा है ,
    : ‘वर्ण – भेद’ “आज भी ज़िन्दा है”.

    मज़बूरी के तवे पर, सिंक रही; स्वार्थ्य की रोटियां ,
    जूठी बोटियों पर झपटते है : लोग ,
    मुंह बाए खड़ी है : चुनौतियां .

    ‘जन—प्रतिनिधि—सभा’ : एक अखाड़ा है ,
    बहुमत : कमजोर–सा नाड़ा है
    वे जब भी जूझते हैं —– इसे ही तो खींचते हैं
    तब व्यवस्था : पूरी तरह ‘नंगी’ नज़र आती है
    ‘ वे’ तो इसके आदी हो चले हैं, ज़नाब !
    मगर, ………………… हमें तो शर्म आती है.

    हमारा ‘मतान्तर’ ही छलता आया है, आज तक हमें
    अगर मेरी ‘अपील’ आपको जमे, तो मत रहिए : अनमने
    कभी तो ‘सार्थक पहल’ कर,
    ‘सही निर्णय’ हम ले सकें अगर
    गर्वोन्नत् होगा मस्तक हमारा,
    देगा वैभव—दस्तक दोबारा
    मन—मन में फिर खिल उठेगा अभिमान,
    जन—जन में होगा गुंजायमान
    मेरा भारत महान
    मेरा भारत महान.

  • “जश्ने आजादी”

    जश्ने आजादी का पल है,आओ खुशी मनाएँ।

    आसमान फहरे तिरंगा, जन गण मन हम गाएँ।

    कालिमा की बीती रातें ,आया नया सवेरा।

    प्रगति -पथ परआगे ,बढ रहा देश अब मेरा।

    अरूणदेव की नूतन किरणें ,नया सवेरा लाई।

    नयी रोशनी पाकर देखो ,कलियाँ भी मुस्काई।

    नहीं खैरात में मिली आजादी,खून बहाकर पाई है।

    खूली हवा में साँसें ले हम,लाखों ने जान गँवाई हैं।

    याद करो वो कहर की बातें ,दुश्मन ने जो ढहाया था।

    मित्रता का हाथ बडा,गुलाम हमें बनाया था।

    लावारिस का वारिस बन,पूरा देश हथियाया था।

    वीर शिवाजी,तात्या टोपे, नाना साहब को याद करो,

    लक्ष्मी बाई,मंगल पांडे की कुर्बानी याद करो।

    याद करो वो जोरे-जुल्म ,दुश्मन ने जो ढहाया था,

    साम,दाम,दण्ड भेद से,कितना हमे दबाया था।

    जलियाँवाला बाग न भूलो, निहत्थों पर वार किया,

    ठीक बैसाखी के दिन,कैसा नर संहार किया।

    अंग्रेजों की कुटिल चाल का ,दिया जवाब शहिदों ने।

    इंकलाब का देकर नारा जान फूँक दी वीरों में।

    भगत् सिंह,सुखदेव ,राजगुरू,बिस्मिल की कुर्बानी याद करो।

    हँसते हँसते चढ गये फाँसी, उनकी कहानी याद करो।

    याद करो नेहरू,पटेल,गाँधी बाबा को याद करो।

    सत्य,अहिंसा और प्रेम के मूल मंत्र को याद करो।

    इनकी कुर्बानी व्यर्थ ना जाए, कसम हमें यह खानी है।

    जाति, धर्म ,भाषा,प्रदेश की दूरी सभी मिटानी है।

    बनी रहे ये आजादी, कसमें हम सबको खानी है।

    विश्व पटल पर भारत माँ की नयी पहचान बनानी है।

    हाँ नयी पहचान बनानी है ,अब नयी पहचान बनानी है।

    जय हिन्द, जय भारती।

    सावित्री प्रकाश

     

  • वंदेमातरम् गाता हूँ

    वंदेमातरम् गाता हूँ

    नारों में गाते रहने से कोई राष्ट्रवादी नहीं बन सकता।
    आजादी आजादी चिल्लाने से कोई गांधी नहीं बन सकता।
    भगत सिंह बनना है तो तुमको फांसी पर चढ़ना होगा।
    देश के लिए कुछ करना है तो हँसते-हँसते मरना होगा॥
    संग आओ तुम भी मेरे, मैं सरहद पर गोली खाता हूँ।
    क्रांति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ।।
    नारों में हम कहते हैं जम्मु और कश्मीर हमारा है।
    पंडित वहाँ से बेघर हो गये, क्या यही भाईचारा है।।अपमान तिरंगे का जब वहाँ पर सरेआम होता है।
    सवाल उठता है, तब जम्हूरीयत कहाँ पर सोता है।
    राजनीति के सर्पों को मैं, अपना लहू पिलाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
    पिद्दी जैसा मुल्क पाकिस्तान हमको आँख दिखाता है।
    नापाक जुबां वो अपने कश्मीर-कश्मीर गाता है॥
    इतने बरसों में हम ये मसला नहीं सुलझा पायें हैं।
    जिसके लिए सीने पर हमने अगणित गोली खायें हैं।
    खामोश कर दूं पाक को और वादी स्वर्ग बनाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
    देशभक्त और देशद्रोही के खेमे में देश बांट रहे हो।
    देशद्रोहियों के तलवे खुद तुम कश्मीर में चांट रहे हो।
    अफजल जिंदाबाद के नारे घाटी में जो लोग लगाते हैं।
    देशभक्त क्या उनके संग मिलकर सरकार चलाते है?
    कथनी और करनी में भेद है क्यूं, ये सवाल मैं उठाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
    जो दुश्मन हमारी सीमा पर घात लगाकर बैठा है।
    उनके घर तुम खाकर आये, कहो ये नाता कैसा है॥
    एक के बदले दस शिश लाऊंगा, ये कहते फिरते थे तुम।
    छप्पन इंच की छाती भी क्या? काले धन जैसे हुई है गुम॥
    झूठे वादे गर किये हो तो, मैं चुनाव में सबक सिखलाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
    दुश्मन के संग जब जब हमने गीत प्रेम के गाये हैं।
    तब तब अपने पीठ पे हमने खूनी खंजर पाये हैं॥
    सहनशीलता को हमारी, दुश्मन कायरता समझता है।
    लातों का भूत है वो, बातों से कहाँ समझता है।।
    धीरज तुम अपने पास रखो, मैं अब बंदूक उठाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ वन्देमातरम् गाता हूँ॥
    सरहद की निगेहबानी में हमने आँखों को बिछाया है।
    घाटी के हिमखण्ड़ो को हमने अपना लहू पिलाया है॥
    जब जब घाटी पर विपदा आई, पसीना हमने बहाया है।
    घाटी के जर्रे-जर्रे के खातिर, जीवन दावं पर लगाया है।।
    अपना घर-द्वार छोड़कर मैं, सियाचिन में बस जाता हूँ।
    क्रांति पथ पर निकला हूँ, मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ।

    जाने क्यों हर भारतवासी को जाति-पाति पर नाज़ है?
    जाति-धरम के दंगल से ही गुंड़ों के सिर पर ताज़ है।।
    टिकट यहाँ पर चुनाव में जाति के नाम से बांटे जाते हैं।
    जाति-पाति के कारण ही,यहाँ गद्हे, शेरों को खाते हैं।।
    रत्ति भर लाभ नहीं जाति से, फिर भी गर्व से बताता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
    आबादी जिसकी जितनी हो उसकी उतनी हिस्सेदारी।
    दलित, आदिवासी, पिछड़ा या हो फिर अबला नारी।।
    कमजोर जनों को कोई भी बलवान अब न लूट सके।
    हाथ पकड़कर चलों सभी कोई भी पीछे न छूट सके॥
    दबे-कुचले ब़ढ़े चलो, तुम्हें मैं राह नई दिखलाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ।।
    देश भक्ति में मज़दूर और किसान क्या किसी से कम है।
    झूल रहे हैं फांसी पे वो, क्या राष्ट्रवादीयों को ये गम हैं?
    योजनाओं में हमारी, किसान की कितनी हिस्सेदारी है।
    भूल जाना अन्नदाता को अपनी मातृभूमि से गद्दारी है।।
    रूई निकालो कान से तुम, किसानों की चीख सुनाता हूँ
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ।
    कुछ लोग पूंजीपति और कोई दशरथ मांझी क्यों है?
    आजादी के इतने बरस बाद भी गरीबी बाकी क्यों है?
    बेबसी, लाचारी,और बीमारी, गरीबों का साथी क्यों है?
    सरस्वती के देश में शिक्षा को लेकर उदासी क्यों हैं?
    बचपन चीखकर कहता है, मैं भट्ठी में खप जाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
    छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर जाने क्यों ये बोझा है।
    कोई में चाय बेच रहा है कोई सिर पर पत्थर ढ़ोता है॥
    दिनभर धूप में जलकर बचपन रात को फुटपाथ पे
    सोता है।
    स्कूल के दरवाजे पर खड़े-खड़े मज़दूर का बेटा रोता है।
    शिक्षा जबसे व्यापार बना है मैं कौड़ी के मोल बिक जाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥

    नेताओं की तू-तू , मैं-मैं संसद में जनता चुपचाप देख रही है।
    कानून आँख में पट्टी बांधे शमशान में आग सेक रही है।
    जलती है हर रोज लाशें गरीब, मज़दूर और किसानों की।
    बलि मांग रही है बेरोजगारी, पढ़े-लिखे नव जवानों की।
    नेता जी संसद में कहते हैं मैं पूंजीपतियों को रिझाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ॥
    घोटालों में फसनेवाले, लोकतंत्र बचाओ नारा लगाते हैं।
    सत्ताधीश बनते ही वो, लोकतंत्र का गला दबाते हैं॥
    पुलिसिया डंडे के बल पर वो अपना राज चलाते है।
    जांच एजेंसियों को सरकारें अपने इशारों पर नचाते है।
    जनता की आवाज़ हूँ मैं, जंतर-मंतर पे लाठी खाता हूँ।
    क्रान्ति-पथ पर निकला हूँ मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ॥
    हर वाद-विवाद के पीछे राजनीति मुँह छुपाये बैठी है।
    आतंक का कोई धरम नहीं फिर तरफ़दारी ये कैसी है।।
    गुनाहगारों के लिए सजा लिखो,निर्दोषों छोड़ो तुम।
    हर मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम से बेवज़ह मत जोड़ो तुम।
    दाऊद हो या साध्वी, मैं दोनों पर मौन नहीं रह पाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम गाता हूँ।।
    परिवारवाद से भरी पड़ी है सड़कें बेचारी दिल्ली की।
    राजनीति खेल बन गयी है अब डंडे और गुल्ली की।।
    जनता भी अंजान नहीं है वो सारा खेल समझती है।
    देखें घोटाले बाजों की गद्दारी कब तक छिपती है।।
    देखे तो अपनी सुरत दिल्ली, मैं दर्पण दिखलाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
    समानता जब आएगी तो दुश्मन भी पक्का साथी होगा।लड़ना छोड़ो आपस में, फ़िर हरेक घर में गांधी होगा॥
    जाति-धरम का खेल खेलना राजनीति अब बंद करे।
    दंगा-फसाद की राह छोड़ कट्टरता का हम अंत करें।
    मैं तो प्रेम का पुजारी हूँ गीत मिलन के गाता हूँ।
    क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 7693919758

  • लौट आओ अपने खेतों पर

    लौट आओ अपने खेतों पर

    लौट आओ अपने खेतों पर अब हरित क्रान्ति लिख देंगे।
    उजाड़ गौशाला को सजाकर अब श्वेत क्रान्ति लिख देंगे।

    फिर से नाम किसानों का  लाल बहादुर शास्त्री लिख देंगे।
    अपनी लहू सिंचित करके माटी को अन्नदात्री लिख देगे॥

    कर्ज से तुम मत घबराना धान की बाली से वादी लिख देंगे।
    गेहूँ मक्का गन्ना जौं  की फसलों को सोना चांदी लिख देंगे॥

    बीती बात बिसार दो नई तकनीकों से अमिट कहानी लिख देंगे।
    खेतों पर तपने वाली माँ, बहनों को झांसी की रानी लिख देंगे॥

    सुखी हुई धरती पर हल चलाकर आज जवानी लिख देगें।
    सुनाकर रहट की सरगम अब रुठे बादल में पानी लिख देंगे।

    लाल काली  मिट्टी  से मजदूरों  को वीर शिवाजी लिख देंगे।
    घाटे के सौदों को अपने बाहू बल से जीती बाजी लिख देंगे।।

    जामुन अर्जुन के शाखों को, हम अपनी दादी नानी लिख देंगे।
    बंजर हो चुके मेड़ों के  जर्रे-जर्रे को पुरखों निशानी लिख देंगे॥

    हिम्मत हारना कायरता है मेहनत के बल पर गांधी लिख देंगे।
    खेत के हर एक पत्थर पर हम अब दशरथ मांझी  लिख देंगे।

    निरझर बहते हुये पसीनों से  हम ,नहरों को वैतरणी लिख देंगे।
    भारत माता के वीर सपूत अब खलिहानों को जननी लिख देंगे।।

    नेताओं के झुठे वादे बहुत हो चुके अब तो इनको बासी लिख देंगे।
    कुछ तो सच बोलो अब, नहीं तो तुम्हें अतीत के वासी लिख देंगे।

    कुछ योजना हमारे लिये बनाओ वर्ना तुम्हारी अय्यासी लिख देंगे।
    काली करतूतें  बहुत हो चुकीं अब सारी जाल -साझी लिख देंगे॥

    ओमप्रकाश चन्देल”अवसर”

    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

    7693919758

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  • ” किस्सा–कुर्सी — का “

    व्यंग्य गीत ———– अनुपम त्रिपाठी
    ” किस्सा–कुर्सी — का ”
    बचपन में किस्सों में कुर्सियों की बातें सुनते थे।आजकल कुर्सियों के किस्से आम हैं । लेकिन ये कुर्सियाँ मिलती कैसे हैं ?
    इस लोकतंत्र की महती विडम्बना भी यही है कि ; कुर्सी सेवा पर हावी है।
    बेशक ; लोकतंत्र जीवित है ——– जीवन्त नहीं बना पाए हम इसे ।
    क्या अपने वर्तमान — अपने इतिहास से सीखा है;हमने कुछ!!!
    —————–*********—————–
    ये कुरसी का खेल रे भैया ; ये कुरसी का खेल है |
    राजनीति में आज शराफत ; बुरीतरह से फेल है ||
    अर्थव्यवस्था गिरवी हो गई ; विश्व-बैंक के हाथों में ।
    बजट तोडता दम ये हमारा ; कर्ज के भारी खातों में ।।
    भूख–गरीबी–बेकारी या ; रोटी–कपड़ा और मकान।
    सिमट के सारी तकलीफें भी ; रह गई कोरी बातों में ।।
    मज़हब : वोट बैंक बन गया ; धर्म बना : सत्ता की सीढी।
    पिछला कितना भोगा हमने ; भोगेगी अब अगली पीढ़ी ।।
    सबसे सस्ता खून हो गया ; बिकता मंहगा तेल रे भैया।
    ————————– ये कुर्सी का खेल है भैया ।।1।।
    ————————-
    “दल–दल”में दल मिलते जाते ; नया मोर्चा रोज बनाते।
    जनता का दिल धडका करता ; सेन्सेक्स के आते – जाते।।
    संविधान का चीर –हरण अब ; संसद में भी आम हो गया।
    नैतिकता और जनसेवा का ; नारा ही बदनाम हो गया।।
    घडियालों से पटा पडा है ; लोकतंत्र का महासमन्दर।
    अपना ही सिर मूंड रहे हैं ; “गाँधी—- टोपी वाले बंदर” ।।
    जेब में दम हो– तुम भी खरीदो ;चुने हुओं की सेल रे भैया।
    —————————- ये कुर्सी का खेल रे भैया ।।2।।
    ————————
    जब हों इलेक्शन—-भूल के फ्रेक्शन ; सारे एक हो जाते हैं।
    अल्पसंख्यक और दलित नाम पर ; सारे नेक बन जाते हैं।।
    हिन्दू–मुस्लिम—सिख–ईसाई ; कहता कौन हैं : भाई-भाई।
    अलग–अलग कानून सभी के ; जुदा—जुदा है : रहनुमाई।।
    वोट का सारा गणित इन्हीं से ; ताश के बाबन — पत्ते हैं ।
    वक्त — जरुरत ट्रम्प — कार्ड ये ; बाद में सारे छक्के हैं ।।
    पाँच साल तक सोते रहते ; फिर मचती रेलम-पेल है भैया।
    —————————– ये कुर्सी का खेल रे भैया ।l3ll
    ——————-
    ज्यों–ज्यों मंहगी हुई है खादी ; नेताओं के मूल्य गिरे हैं ।
    नैतिकता के ताने—–बाने ; नेतृत्व के कारण बिखरे हैं ।।
    मूल्यवृध्दि में पिसकर अब ; जनता ये सिर धुनती है ।
    धूँ….धूँ करके देश जल रहा ; ” दिल्ली ॐचा सुनती है “।।
    अरे ! जागो—-जागो भारतवालों ; देश तुम्हारी थाती है।
    ” सिंहासन खाली करो …… कि ; जनता आती है ” ।।
    मेरा देश महान है , क्योंकि ; लोकतांत्रिक जेल है भैया।
    ————————- ये कुर्सी का खेल है भैया ।।4।।
    ————————-
    संविधान की सब धारायें ; सुविधा के आधार पर चलतीं।
    नेताओं की निष्ठायें भी ; मौका देख के रंग बदलतीं ।
    दो दूनी वे पांच हो गए ; पत्थर थे : अब काँच हो गए ।
    इतना झूठ पका हांडी में ; नेता सारे : आँच हो गए ।।
    देशप्रेम अब हवा हो गया ; सुन बापू ! ये क्या हो गया ?
    फिर से तिरंगा बीच सडक पर;जाने न्याय कहां खो गया।।
    मरजी पे मतदान कराते ; इनकी कहां नकेल रे भैया ..।।
    ————————— ये कुरसी का खेल रे भैया ।।5।।
    ***************
    (अपने जन्मस्थान की वीरांगना रानी झांसी को और उनके माध्यम से समस्त स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को श्रृध्दासुमन सहित ] **************
    आजादी की अमर—- कहानी ; जाने कितनी बार पढी ।
    फिर भी याद नहीं ये हमको ; कहां की ” रानी खूब लडी” ।।
    कौव्वे सारे शिखर पे बैठे ; भटक रही कोयल वन–वन में ।
    सुलग रही है — आग मगर ये ; हौले — हौले जनगण में ।।
    अब विश्वास करें हम किसपर? और किसे हम अपना मानें ??
    हर चुनाव में दुविधा भारी ; अंधे चुनें …… या चुन लें काने।।
    जहाँ हो मरजी — चेन खींच लो ; देश ये जनता–रेल है भैया।
    अब बदलाब जरुरी “अनुपम” ; बासी हो गई भेल रे भैया ।।
    ——————————ये कुरसी का खेल रे भैया ।।6।।
    ……………….. ये कुरसी का खेल है……… ………………………..
    ‪#‎anupamtripathi‬
    ‪#‎anupamtripathiG‬
    *******************——-**************

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