क्यों कुछ कहते नहीं।

क्यों कुछ कहते नहीं,
सब गूंगे बहरे बैठे हैं ,
सबके भीतर जलती है आग,
फिर क्यों खामोश बैठे हैं,
खो दिया है सम्मान को ,
अपने भीतर के इंसान को,
तभी तो चुप ही रहते हैं,
होती है वारदातें आंखों के सामने ,
फिर क्यों ,आवाज दबाए रहते हैं।

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