खुली किताब

कहा था तुमसे ,
किताब ना बनो !
पर नहीं माने तुम।

शायद!
अच्छा लगता होगा तुमको,
किसी के द्वारा पढ़ा जाना।

चौराहे पर इश्क लड़ाने का
शौक है तुम्हे।
जब देखो यहां वहां
कबूतर बाजी किया करते हो।

दिल नहीं घबराता तुम्हारा,
प्रेम का तमाशा बनाने में!

प्रेमी युगल तो छुप- छुपके मिलते हैं इधर उधर
पर शायद लोगों की निगाह में आ ही जाते हैं।

उड़ी उड़ी सी रंगत ,
खोई खोई सी शक्ल,
हैरान-परेशान सी हंसी,
चेहरे पर उमड़ता नेह,
आंखों की गहराइयों में से झांकते कुछ पल
सब कुछ बयां कर देते हैं।

शायद कुछ भी छुपा नहीं रह जाता,
बात बात में झलकती मुस्कुराहट,
भीड़ में भी अकेलापन ढूंढता मन।
किसी की पारखी नजरों से बच नहीं सकता।

भले ही वह जानकर अनजान बन जाए।
जानते हो!
लोग तो समुंदर की गहराइयों से भी मोती ढूंढ लाते हैं
और यह तो ठहरा
फकत तेरा मेरा इश्क।

निमिषा सिंघल

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