गजल- बचाने चले है |

गजल- बचाने चले है |
जान उनकी बचे जो सबको बचाने चले है |
डाल जोखिम मे दरिया प्यार बहाने चले है |
जानते है अंजाम अच्छा नहीं मर भी सकते |
फिक्र लोगो की है मरीज दवा खिलाने चले है |
बखस्ता नहीं ये कोरोना राजा रंक किसी को |
हिम्मत देखिये उसी से नजरे मिलाने चले है|
सब कहते डॉक्टर खुदा का दूजा रूप है यहा |
कुछ जाहिल बेहूदगी अपनी अब दिखाने चले है |
नहीं जानता कोरोना हिन्दू मुस्लिम न और कुछ |
बददिमागी का नमूना वो अपनी लिखाने चले है |
मिलकर भगाओ सब कोरोना मानवता दुशमन है |
लोगबाग पुलिस सरकार कोरोना मिटाने चले है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
व्हात्सप्प्स -8210525557

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