गजल

……………गजल………….
हम समंदर को समेटे चल रहे है
ठंडे पानी में भी हम उबल रहे है !
दुश्मनों के पर निकलते जा रहे है
देख अपनो की खुशी हम जल रहे है ||

है बडी मुश्किल उन्हे समझाये क्या
जो नादानों की तरह बस पल रहे है |
ये उन्हे शायद नही मालूम हो
हम तो उनके ही सदा कायल रहे है ||

आईनों से क्या करे शिकवा कोई
दाग ही चेहरे से नही निकल रहे है |
गैर तो मतिहीन होते गैर है लेकिन
आज अपनो को ही अपने छल रहे है
उपाध्याय…

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