जज्बात

जिक्र ए जहन
किससे करें हम
लफ़्ज हैं दबे दिल में कहीं
शायद डर रहें हैं
बाहर निकलने से
कोई समझेगा या नहीं
क्या कहेगा कोई
इसी उधेड़बुन में
खोई रहती हूं अपने ख्यालों में
करती हूं इंतजार
उस पल का
जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
जहन की दीवारों को


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12 Comments

  1. मोहन सिंह मानुष - July 23, 2020, 4:55 pm

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - July 23, 2020, 8:37 pm

    बेहतरीन

  3. Geeta kumari - July 23, 2020, 9:06 pm

    Nice lines

  4. Neha - July 25, 2020, 9:18 am

    Umda

  5. Satish Pandey - July 25, 2020, 6:58 pm

    “जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
    जहन की दीवारों को” में अनुप्रास से अलंकृत कर मन में छिपे जज्बातों को पंक्तिबद्ध करने का सुन्दर प्रयास है. वाह

  6. Abhishek kumar - July 30, 2020, 9:43 pm

    गागर में सागर भर दिया है

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