जीवन से हम क्या लिए

जद्दोजहद में जीवन के अनमोल लम्हेरुठते चले गए,
और मैं बेखबर मोहरों के चाल में उलझी,
पढ़ाव दर पढ़ाव उलझती चली गयी,
जीत -हार से क्या मिले,
चाहे जितनी शीतल बयार चले,
एक झोंका गर रूह को न छुए,
तो जीवन से हम क्या लिए।

दाँव दर दाँव चले,
हार-जीत बीच जीवन से सिर्फ शिकवे-गिले किये,
जीवन के खेल में जब अंतिम पढ़ाव से जा मिले,
सब मोहरे गिरे पड़े,
जीवन से हम क्या लिए।

एकाकी मैं से तब मिले,
जब स्याह अँधेरी रात भयी,
अनन्त विस्तृत जगत में जीवन भी पसर चला
स्वतंत्र मैं शाश्वत अनंत में जा मिला,
निशब्द मैं,स्तब्द जब,
जीवन से हम क्या लिए।


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5 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 29, 2019, 7:06 am

    सुंदर रचना

  2. NIMISHA SINGHAL - November 29, 2019, 7:51 am

    Wah

  3. Abhishek kumar - November 29, 2019, 8:26 am

    Nice

  4. देवेश साखरे 'देव' - November 29, 2019, 12:47 pm

    सुन्दर रचना

  5. nitu kandera - December 2, 2019, 7:46 am

    सुन्दर

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