नव वर्ष आई

गुजं उठी चहू दिश
नव वर्ष की नव शहनाई।
करवट बदलती आसमां पे छाई,
नव किरण लै पुरवाई आई।
उमंगों भरा उत्सव गीत आज,
चहकती चहचहाती चिडि़यों ने गाई।
नव वर्ष देख बागों की,
खिल उठी मादक पुष्पाई।
रवि लिये नया सबेरा,
स्वर्णिम किरण बिखराई।
नव वर्ष आई- नव वर्ष आई,
गुजं उठी नव शहनाई।

योगेन्द्र कुमार निषाद ,घरघोड़ा ( छ.ग.)


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3 Comments

  1. Ashmita Sinha - December 28, 2017, 12:16 pm

    Nice poem

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 1, 2019, 11:36 pm

    वाह बहुत सुंदर

  3. Abhishek kumar - November 27, 2019, 7:21 am

    Good

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