“ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं”

ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं,
मेरी हर अताओं को सरज़द स्वीकार करते हैं,

हया की तीरगी को वो नज़र से खा़क  करते हैं,
भरी महफिल में भी मुझसे निगाहें चार करते हैं,

मेरी हर अजाँओं को   निगाह-ए-पाक   करते हैं,
मेरे हर अल़म को भी   जलाकर   ऱाख करते हैं,

अहद-ए-हवादिश में भी तबस्सुम-जा़र करते हैं,
मेरी   हर  सदाओं   को सुपुर्द-ए-ख़ाक करते हैं,

कैद-खानें    में   ही      सही  मेरे    तिमसाल से,
वो      गुफ़्तगू        दो        चार      करते     हैं,


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Student At Hansraj college , Delhi University

3 Comments

  1. Gaurav Singh Poet - May 31, 2016, 9:40 am

    Waah….

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 11, 2019, 1:51 pm

    वाह बहुत सुंदर

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