नौकरशाही आस्था

ये कैसी है आस्था, जिसमे समाई नौकरशाही |

ये कैसी है व्यथा, जिसे सुन कर मन डगमगाई ||
ये कैसी है अखंडता, जिसमे धर्मनिरपेक्षता की नींव मरमराई |
ये कैसी है अटूटता, जिसमे भ्रमता की नक्काशी समाई ||

वो कौन सी है व्याख्या, जिसे सुनाकर हुए हैं विख्यात |
वो कौन सी है अदा, जिसे प्रदर्शित कर करते हैं आयात ||
वो कौन सा है व्यवसाय, जिसमे पाते हैं लाभ अकस्मात |
वो कौन सा है पाप, जो धुलता है करने के पश्चात ||

किस शासन प्रणाली को मानते हो तुम |
राज्य के अंदर राज्य बना बैठे हो तुम ||
किसने दिया माप की इकाई परिवर्तन करने का अधिकार |
गाँधी छोड़ उनके नाम के सिक्के, ठप्पों का प्रचार ||

अधर्म लक्षणो का प्रदाफ़ाश होता है सबका ख्याल |
फिर क्यों बनते है लोग उनकी सेना और ढाल ||
हे मानस, ना तेरे राम, ना श्याम है दिखते |
सारे के सारे, तेरे बाज़ार में है बिकते ||

फिर किससे ये प्रेम, किसका है डर |
उल्लेखनीय बातों पर ना कर तू फिकर ||
सबको पाप-पुण्य का होता है पूर्ण ज्ञात |
प्रायश्चित के लिए क्यों बनते हैं अज्ञात ||

अगर तू मानता है धरा पर है तेरा भगवान |
तो तू भी उस माटी का बना, वो भी, सारे गुण हैं समान |
फिर क्यों भेजता है उसके द्वारा अपनी पहचान ||
क्या तेरा भगवान सिर्फ़ पुजारियों को है दर्शन देता |
अपने भक्तजन की गुज़ारिश सिर्फ़ उसी से है लेता ||

हे प्रिय, तुम्हारे चाहने वालों का वास्ता |
अभी भी वक्त है बदलो अपना रास्ता….||

–       सोनू कुमार

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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