फिर से राम

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रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

‪#‎विकास_भान्ती‬

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5 Comments

  1. Kapil Singh - November 13, 2015, 4:27 pm

    laazbaab poem sir ji

  2. anupriya sharma - November 13, 2015, 5:16 pm

    new thoughts in old style..gud one

  3. राम नरेशपुरवाला - September 12, 2019, 12:50 pm

    Good

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