फिर से राम

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

‪#‎विकास_भान्ती‬

Comments

6 responses to “फिर से राम”

  1. Kapil Singh Avatar
    Kapil Singh

    laazbaab poem sir ji

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Tnx Kapil bhai

  2. anupriya Avatar
    anupriya

    new thoughts in old style..gud one

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Tnx 🙂

  3. राम नरेशपुरवाला

    Good

  4. Satish Pandey

    Very nice

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