बन बंजारा बन -बन भटकत है
मन मेरे तु कहा अटकत है
तुझे ढूढन को में मन्दिर-मन्दिर फिरत
तू मेरे मन मन्दिर में बसत है
हर एक गोपी को पूंछा करता
दिल को अपने, अंगारों से सींचा करता
यमुना तट,कदंब की डारी
गोपियां भी सारी की सारी
है प्रभु तुम्हे पूंछा करत है
बन बंजारा बन – बन भटकत है
मन मेरे तु कहा अटकत है
अब उधव जो आए पूछूंगा
ना कोई जोग सन्देश सुनूंगा
कहा मेरे श्याम सुंदर छिपत है
क्या उनके पास हमारे लिए बखत है
क्या उनको सबसे प्यारा तखत है
बन बंजारा बन -बन भटकत है
मन मेरे तु कहा अटकत है
घनघोर घटा काली रात है
है प्रभु सुनो कहत शिवराज है
घूमकर देख लिया बृज आज है
ना वैसी शांति ना वैसा रास है
ना वैसी ममता ना वैसा दुलार है
ना वैसा भाईचारा ना वैसा प्यार है
अब देर ना करो मेरे सांवरे
जल्दी आकर सुध लो सांवरे
भक्त तुम्हारे भटकत है
बन बंजारा बन -बन भटकत है
मन मेरे तु कहा अटकत है
शिवराज खटीक
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