बांधकर बेड़ियों से कोमल पैरों को खींच कर

बांधकर बेड़ियों से कोमल पैरों को खींच कर

बांधकर बेड़ियों से कोमल पैरों को खींच कर,
घर की चौखट के बाहर वो कभी जाने नहीं देते,

हिम्मत जो जुटाती है बेटी कोई पढ़ने को,
तो उसके कदमों को आगे कभी वो जाने नहीं देते,

कितने संकुचित मन होते हैं वो,
जो झूठी रस्मों से बाहिर कभी आने नहीं देते।।
राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

बेटी से सौभाग्य

बेटी घर की रौनक होती है

माँ

यादें

3 Comments

  1. Neetika sarsar - March 29, 2018, 12:01 pm

    osm

Leave a Reply