मनमर्ज़ियाँ

चलो थोड़ी मनमर्ज़ियाँ करते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
यूँ तो ज़रूरतें रास्ता रोके रखेंगी हमेशा
पर उन ज़रूरतों को पीछे छोड़
थोड़ा चादर के बाहर पैर फैलाते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
ये जो शर्मों हया का बंधन
बेड़ियाँ बन रोक लेता है
मेरी परवाज़ों को
चलो उसे सागर में कही डूबा आते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
कुछ मुझको तुमसे कहना है ज़रूर
कुछ तुमसे दिल थामे सुनना है ज़रूर
खुल्लमखुल्ला तुम्हे बाँहों में भर
अपनी धड़कने सुनाते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
लम्हा लम्हा कीमती है इस पल में
कल न जाने क्या हो मेरे कल में
अभी इस पल को और भी खुशनसीब
बनाते हैं
तारों की चादर ओढ़ कुछ गुस्ताखियाँ
फरमाते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
ये समंदर की लहरें , ये चाँद, ये नज़ारें
इन्हे अपनी यादों में बसा लाते हैं
थोड़ा बेधड़क हो जी आते हैं
पंख लगा कही उड़ आते हैं
चलो थोड़ी मनमर्ज़ियाँ करते हैं …


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11 Comments

  1. राही अंजाना - November 11, 2019, 2:25 pm

    जी

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 11, 2019, 2:38 pm

    Wah

  3. nitu kandera - November 11, 2019, 4:32 pm

    waj

  4. NIMISHA SINGHAL - November 11, 2019, 8:51 pm

    Wah

  5. nitu kandera - November 11, 2019, 10:54 pm

    वाह

  6. Ashmita Sinha - November 12, 2019, 1:07 am

    Nice

  7. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 12, 2019, 7:01 am

    Good

  8. Raj Bhatia - November 13, 2019, 5:44 am

    वाह

  9. Archana Verma - November 13, 2019, 5:11 pm

    BAHUT BAHUT DHNYAWAD AP SABKA

  10. Abhishek kumar - November 24, 2019, 9:08 am

    चलो

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