मुक्तक

न मैं तुलसी जैसा हूँ ,और न मैं खुसरो जैसा हूँ,
मेरी कल्पना अपनी है ,सच नहीं दुसरो जैसा हूँ ।

हम सभी एक ही ग्रन्थ के ,हाँ हर पन्नो सिमटे है,
छन्दों में जो सिमट जाऊ तो,सुंदर बहरो जैसा हूँ ।।

लालजी ठाकुर


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4 Comments

  1. anupriya sharma - July 10, 2016, 6:52 pm

    Nice

  2. Feran kurrele - July 11, 2016, 12:24 am

    umda …

  3. राम नरेशपुरवाला - September 21, 2019, 4:26 pm

    सुन्दर

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