मेरे कालिदास

मेरे कालिदास

गुंजन है धड़कनों में!

यह किसके पदचापों की आवाज है?
क्या यह तुम हो?
मेरे कालिदास!
जिन्हें बंद आंखें भी पहचानती हैं।
क्यों आए अचानक आज इतने चुपचाप?

मेरे मन की आंखें
और धड़कनों के कान
तुम्हारी हर आहट
पहचानते है।

मेरे कालिदास!
कहा था ना मैंने!
जा तो रहे हो,
शास्त्री जी बन वापस जरूर आओगे
विश्वास है मेरा।

और अब की बार जब आओ
कभी ना वापस जाने के लिए आना।

तुम्हारी आहट सुन रही हूं मैं,
विश्वास की जीत का नजारा
बंद आंखों से दिख रहा है मुझे।
इंतजार रहेगा तुम्हारा कालिदास!

तुम्हारी विद्योत्तमा

निमिषा सिंघल


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15 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 17, 2019, 7:06 am

    अतिसुंदर हृदयक उदगार

  2. nitu kandera - November 17, 2019, 7:38 am

    nice

  3. देवेश साखरे 'देव' - November 17, 2019, 11:27 am

    सुन्दर रचना

  4. Ashmita Sinha - November 17, 2019, 3:01 pm

    Nice

  5. Poonam singh - November 17, 2019, 5:38 pm

    Wah

  6. राही अंजाना - November 17, 2019, 6:01 pm

    अच्छा

  7. Abhishek kumar - November 23, 2019, 10:30 pm

    मार्मिक

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