” लूटा जाता हूँ , ” मैं ” “

कफ़स दिल में कुछ जज़्बात .. आबो संग बीता जाता हूँ ,  ” मैँ “…..

पुष्प हूँ , खिलनें के लिए बना हूँ ….

 

फ़िर भी ना जाने क्यों , मुरझा जाता हूँ , ” मैँ “….

 

ज़रा कर इक निग़ाह मेरी और , ए – मेहरबान …..

 

 

रंज में रहता हूँ , फिर भी अपनों पर ख़ुशियां लूटा जाता हूँ , ” मैं ” 

 

पंकजोम ” प्रेम “

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तराश लेता हूँ सामने वाले की फितरत ...... बस एक ही नज़र में ..... जब कलम लिख देती है , हाल - ए - दिल .... तो कोई फ़र्क नहीं रहता ..... जिंदगी और इस सुख़न - वर में....

8 Comments

  1. devesh kumar - December 14, 2015, 1:09 pm

    बहुत खूब… क्या लिखा है

  2. Panna - December 14, 2015, 7:31 pm

    Laazbaab janaab

  3. anupriya sharma - December 14, 2015, 8:03 pm

    very beautiful poem 🙂

  4. Anjali Gupta - December 15, 2015, 5:43 pm

    words are not enough to praise your poem..nice one!

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