वंदेमातरम् गाता हूँ

नारों में गाते रहने से कोई राष्ट्रवादी नहीं बन सकता।
आजादी आजादी चिल्लाने से कोई गांधी नहीं बन सकता।
भगत सिंह बनना है तो तुमको फांसी पर चढ़ना होगा।
देश के लिए कुछ करना है तो हँसते-हँसते मरना होगा॥
संग आओ तुम भी मेरे, मैं सरहद पर गोली खाता हूँ।
क्रांति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ।।
नारों में हम कहते हैं जम्मु और कश्मीर हमारा है।
पंडित वहाँ से बेघर हो गये, क्या यही भाईचारा है।।अपमान तिरंगे का जब वहाँ पर सरेआम होता है।
सवाल उठता है, तब जम्हूरीयत कहाँ पर सोता है।
राजनीति के सर्पों को मैं, अपना लहू पिलाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
पिद्दी जैसा मुल्क पाकिस्तान हमको आँख दिखाता है।
नापाक जुबां वो अपने कश्मीर-कश्मीर गाता है॥
इतने बरसों में हम ये मसला नहीं सुलझा पायें हैं।
जिसके लिए सीने पर हमने अगणित गोली खायें हैं।
खामोश कर दूं पाक को और वादी स्वर्ग बनाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
देशभक्त और देशद्रोही के खेमे में देश बांट रहे हो।
देशद्रोहियों के तलवे खुद तुम कश्मीर में चांट रहे हो।
अफजल जिंदाबाद के नारे घाटी में जो लोग लगाते हैं।
देशभक्त क्या उनके संग मिलकर सरकार चलाते है?
कथनी और करनी में भेद है क्यूं, ये सवाल मैं उठाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
जो दुश्मन हमारी सीमा पर घात लगाकर बैठा है।
उनके घर तुम खाकर आये, कहो ये नाता कैसा है॥
एक के बदले दस शिश लाऊंगा, ये कहते फिरते थे तुम।
छप्पन इंच की छाती भी क्या? काले धन जैसे हुई है गुम॥
झूठे वादे गर किये हो तो, मैं चुनाव में सबक सिखलाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
दुश्मन के संग जब जब हमने गीत प्रेम के गाये हैं।
तब तब अपने पीठ पे हमने खूनी खंजर पाये हैं॥
सहनशीलता को हमारी, दुश्मन कायरता समझता है।
लातों का भूत है वो, बातों से कहाँ समझता है।।
धीरज तुम अपने पास रखो, मैं अब बंदूक उठाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ वन्देमातरम् गाता हूँ॥
सरहद की निगेहबानी में हमने आँखों को बिछाया है।
घाटी के हिमखण्ड़ो को हमने अपना लहू पिलाया है॥
जब जब घाटी पर विपदा आई, पसीना हमने बहाया है।
घाटी के जर्रे-जर्रे के खातिर, जीवन दावं पर लगाया है।।
अपना घर-द्वार छोड़कर मैं, सियाचिन में बस जाता हूँ।
क्रांति पथ पर निकला हूँ, मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ।

जाने क्यों हर भारतवासी को जाति-पाति पर नाज़ है?
जाति-धरम के दंगल से ही गुंड़ों के सिर पर ताज़ है।।
टिकट यहाँ पर चुनाव में जाति के नाम से बांटे जाते हैं।
जाति-पाति के कारण ही,यहाँ गद्हे, शेरों को खाते हैं।।
रत्ति भर लाभ नहीं जाति से, फिर भी गर्व से बताता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
आबादी जिसकी जितनी हो उसकी उतनी हिस्सेदारी।
दलित, आदिवासी, पिछड़ा या हो फिर अबला नारी।।
कमजोर जनों को कोई भी बलवान अब न लूट सके।
हाथ पकड़कर चलों सभी कोई भी पीछे न छूट सके॥
दबे-कुचले ब़ढ़े चलो, तुम्हें मैं राह नई दिखलाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ।।
देश भक्ति में मज़दूर और किसान क्या किसी से कम है।
झूल रहे हैं फांसी पे वो, क्या राष्ट्रवादीयों को ये गम हैं?
योजनाओं में हमारी, किसान की कितनी हिस्सेदारी है।
भूल जाना अन्नदाता को अपनी मातृभूमि से गद्दारी है।।
रूई निकालो कान से तुम, किसानों की चीख सुनाता हूँ
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ।
कुछ लोग पूंजीपति और कोई दशरथ मांझी क्यों है?
आजादी के इतने बरस बाद भी गरीबी बाकी क्यों है?
बेबसी, लाचारी,और बीमारी, गरीबों का साथी क्यों है?
सरस्वती के देश में शिक्षा को लेकर उदासी क्यों हैं?
बचपन चीखकर कहता है, मैं भट्ठी में खप जाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वंदेमातरम् गाता हूँ॥
छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर जाने क्यों ये बोझा है।
कोई में चाय बेच रहा है कोई सिर पर पत्थर ढ़ोता है॥
दिनभर धूप में जलकर बचपन रात को फुटपाथ पे
सोता है।
स्कूल के दरवाजे पर खड़े-खड़े मज़दूर का बेटा रोता है।
शिक्षा जबसे व्यापार बना है मैं कौड़ी के मोल बिक जाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥

नेताओं की तू-तू , मैं-मैं संसद में जनता चुपचाप देख रही है।
कानून आँख में पट्टी बांधे शमशान में आग सेक रही है।
जलती है हर रोज लाशें गरीब, मज़दूर और किसानों की।
बलि मांग रही है बेरोजगारी, पढ़े-लिखे नव जवानों की।
नेता जी संसद में कहते हैं मैं पूंजीपतियों को रिझाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ॥
घोटालों में फसनेवाले, लोकतंत्र बचाओ नारा लगाते हैं।
सत्ताधीश बनते ही वो, लोकतंत्र का गला दबाते हैं॥
पुलिसिया डंडे के बल पर वो अपना राज चलाते है।
जांच एजेंसियों को सरकारें अपने इशारों पर नचाते है।
जनता की आवाज़ हूँ मैं, जंतर-मंतर पे लाठी खाता हूँ।
क्रान्ति-पथ पर निकला हूँ मैं वन्दे मातरम् गाता हूँ॥
हर वाद-विवाद के पीछे राजनीति मुँह छुपाये बैठी है।
आतंक का कोई धरम नहीं फिर तरफ़दारी ये कैसी है।।
गुनाहगारों के लिए सजा लिखो,निर्दोषों छोड़ो तुम।
हर मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम से बेवज़ह मत जोड़ो तुम।
दाऊद हो या साध्वी, मैं दोनों पर मौन नहीं रह पाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम गाता हूँ।।
परिवारवाद से भरी पड़ी है सड़कें बेचारी दिल्ली की।
राजनीति खेल बन गयी है अब डंडे और गुल्ली की।।
जनता भी अंजान नहीं है वो सारा खेल समझती है।
देखें घोटाले बाजों की गद्दारी कब तक छिपती है।।
देखे तो अपनी सुरत दिल्ली, मैं दर्पण दिखलाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
समानता जब आएगी तो दुश्मन भी पक्का साथी होगा।लड़ना छोड़ो आपस में, फ़िर हरेक घर में गांधी होगा॥
जाति-धरम का खेल खेलना राजनीति अब बंद करे।
दंगा-फसाद की राह छोड़ कट्टरता का हम अंत करें।
मैं तो प्रेम का पुजारी हूँ गीत मिलन के गाता हूँ।
क्रान्ति पथ पर निकला हूँ मैं वन्देमातरम् गाता हूँ॥
ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 7693919758

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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