व्यंग्य —- पूंछ पुराण

व्यंग्य ……………………………………
****** पूंछ— पुराण (समग्र)******
कभी देखा है ;आपने , ऐसा कुत्ता !
जो ; देखने में हो छोटा–सा
मगर;पूंछ उसकी लंबी हो
यानि कि ; —— भली–चंगी हो.
जी हाँ !
कई ऐसे कुत्ते हैं : यहाँ
और बहुतायत में हैं : वे पूंछें
जो;जरुरत पड़ने पर,किसी भी कुत्ते के पीछे लग जाती हैं
……………………. अपने — आप को खू—-ब हिलाती हैं .
पूंछ की महिमा निराली है…………
तमंचा है : कुत्ता — तो ; पूंछ : दुनाली है.
पूंछ : आजकल शान का प्रतीक है……
सोचिये जरा! पूंछविहीन कुत्ता भी कितना खाली-खाली है ?
कुत्ता नामक ” संज्ञा ” पर ;
पूंछ : “विशेषण ” की तरह नज़र आती है
……..हिलते रहने की प्रक्रिया दोहराती है.
यहाँ ” कुत्ता ” ; पशु नहीं ——— प्रतीक है
लोकतांत्रिक व्यवस्था है ———— ठीक है
………. और ; पूंछें तो विशुद्ध व्यक्तिवादी हैं
“वे” ; अभिशप्त हैं ————- हिलने को
स्वाभाविक तौर पर ; इसकी आदी हैं .
फिर भी ; पूंछ की परख कम नहीं होती
……….. कुत्ते के पास है ही “वह इकलौती”
कुत्ता : उसे शान से लटकाये घूमता है
सदैव ……”दूसरों की उठाकर सूंघता है” .
हिलती हुई पूंछ ; कुत्ते को आल्हादित् करती है….
——कुत्ता मिमियाये तो पूंछ दुबक जाती है——-
गुर्राते हुए कुत्ते की ; पूंछ भी क्या खूब फ़बती है !
पूंछ का टेढापन ; कुत्ते के अहम् को संतुष्ट करता है
पूंछ उठाकर ही तो;कुत्ता : विजेता की तरह लगता है.
पूंछ का भूगोल ही ; कुत्ते की नागरिकता तय करता है
: इसी पूंछ से ही तो उसका इतिहास उभरता है.
टेढापन : पूंछ का स्थायी ——— भाव है
दबाव में दुबक जाना जन्मजात् स्वभाव है
कुत्ते : स्वभाव से शान्त् होते हैं
आक्रामक होती हैं ——- : पूंछें
जो अनचाहे हिलती हैं — आपस में मिलती हैं
और घेर लेती हैं ——————- कुत्ते को.
कुत्ता : मुस्कुराता है … खिलखिलाती हैं : पूंछें
कुत्ता : गुर्राता है ……. सहम जाती हैं : पूंछें
कुत्ता : बैचेन है………. बिलखने लगती हैं
पीछे मुड़कर–टांगों में घुसकर ; सहलाने लगती हैं
: कुत्ते को ही हिलाने लगती हैं .
कुत्ता : पूंछों के बीच घिरा खुद को
सुरक्षित् महसूस करता है
पूंछें : कुत्ते के आगे रास्ता और
पीछे “माल” साफ़ करती हैं
—— दोनों का मिलाप दर्शनीय होता है —–
—— औरों के लिये अ-सहनीय होता है —–
यह स्थापित् सत्य है कि ; ————–
सीधे कुत्ते की पूंछ टेढी ही होती है……
कुत्ते का टेढापन ; पूंछ पहिले ही भांप लेती है
खतरा महसूसते ही–सुरक्षित दूरी नाप लेती है
कुत्ते और पूंछ का संबंध सनातन है……….
पूंछ का “आधुनिक नाम ” —– चमचा है
कुत्ता तो सदाबहार बर्तन है………..
कुत्ते को चार लातें मारिये …… पुचकारिए
मान जायेगा ……………..
पूंछ मरोड़ कर देखिए — तुरन्त काट खायेगा .
कुत्ते के बिना पूंछ का अस्तित्व कल्पनातीत है
पूंछविहीन कुत्ता— आजाद भारत का अतीत है
कुत्ता और पूंछ ——— इस दौर की पहचान हैं
पूंछ में ही तो ज़नाब ! कुत्ते की असली जान है.
तो ; हे,मानव !
तू भी कुत्ते की कद्र करना सीख
कुछ भी दबा — कुछ भी ऊलीच
पर;शान्त् खडे कुत्ते की पूंछ कभी मत खींच
——————–पूंछ कभी भी मत खींच.
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‪#‎anupamtripathi‬
‪#‎anupamtripathik‬
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4 Comments

  1. Panna - February 20, 2016, 3:27 pm

    bahut khoob..

  2. Ajay Nawal - February 21, 2016, 10:26 am

    लाजबाव काव्य

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 11:13 pm

    बहुत बढ़िया

  4. Abhishek kumar - November 25, 2019, 9:07 am

    मजा आ गया

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