शोर…

शोर भीतर भी है।
शोर बाहर भी है ।
ये ऐसा मंथन हैं।
जो चलता रहता है।
गुंजता रहता है।
हम शांत नहीं कर पाते।
बस बना लेते हैं।
शोर को अपनी आदत का हिस्सा।

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Responses

  1. हम आदत से लाचार हो कर किसी के हिस्सा बन कर रह जाते है।
    तब शुरू होती है हमारी जीवन की पहली अध्याय।

  2. अशांति का वातावरण चारों तरफ विद्यमान है
    फिर इंसान उसे अपनी आदत का हिस्सा बना ही लेता है
    बहुत सुंदर पंक्तियां

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