यदि होती हमारी अपनी नारी
तो क्या दुर्दशा होती हमारी देखती ये दुनिया सारी
उसके कारण चढ जाती इतनी उधारी जिसे चुकाने में बिक जाती जमीन जायदाद सारी
फिर जब हम गलियों से निकलते तो बोलती ये दुनियादारी :- “देखो जा रहे हैं ये भिखारी ”
यदि होती हमारी अपनी नारी (1) बेलन और झाड़ू की मार भी सकते
बाहर कुछ भी बोलो उसके सामने कुछ नहीं कहते हर पीड़ा खुशी-खुशी सहते
अपने ही घर में नौकर बनकर रहते
हर वक्त दिखाती अपनी थानेदारी
यदि होती हमारी अपनी नारी (2)
दोनों वक्त का खाना भी बनाते
उसको टीवी के सामने ही खाना पकड़ते सुबह चाय भी बिस्तर पर ही पहुंचाते
फिर बच्चों को नहलाकर स्कूल छोड़ने जाते और भी न जाने क्या-क्या दुर्दशा होती हमारी
यदि होती हमारी अपनी नारी (3)
लेकिन हम तो नादान हैं
नारी के त्याग और बलिदान से अनजान हैं नारी कभी मां ,कभी बहन तो कभी पत्नी का रूप धरती है हर रूप में वह अपनों के जीवन में खुशियां भरती है
नारी त्याग और बलिदान की मूर्त है एक सफल पुरुष के लिए नारी की बहुत जरूरत है.
संवर ही जाती जिंदगी हमारी यदि होती हमारी अपनी नारी (4)
” संदीप काला”
हास्य कविता :-” यदि होती हमारी अपनी नारी”
Comments
10 responses to “हास्य कविता :-” यदि होती हमारी अपनी नारी””
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👍👍👍👍
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Thanks
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बहुत खूब
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शुक्रिया जी
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Nice brother
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धन्यवाद भाई साहब
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Nice poem
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आभार स्वामी जी
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बहुत खूब
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धन्यवाद पंडित जी
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