हास्य कविता :-” यदि होती हमारी अपनी नारी”

यदि होती हमारी अपनी नारी
तो क्या दुर्दशा होती हमारी देखती ये दुनिया सारी
उसके कारण चढ जाती इतनी उधारी जिसे चुकाने में बिक जाती जमीन जायदाद सारी
फिर जब हम गलियों से निकलते तो बोलती ये दुनियादारी :- “देखो जा रहे हैं ये भिखारी ”
यदि होती हमारी अपनी नारी (1) बेलन और झाड़ू की मार भी सकते
बाहर कुछ भी बोलो उसके सामने कुछ नहीं कहते हर पीड़ा खुशी-खुशी सहते
अपने ही घर में नौकर बनकर रहते
हर वक्त दिखाती अपनी थानेदारी
यदि होती हमारी अपनी नारी (2)
दोनों वक्त का खाना भी बनाते
उसको टीवी के सामने ही खाना पकड़ते सुबह चाय भी बिस्तर पर ही पहुंचाते
फिर बच्चों को नहलाकर स्कूल छोड़ने जाते और भी न जाने क्या-क्या दुर्दशा होती हमारी
यदि होती हमारी अपनी नारी (3)
लेकिन हम तो नादान हैं
नारी के त्याग और बलिदान से अनजान हैं नारी कभी मां ,कभी बहन तो कभी पत्नी का रूप धरती है हर रूप में वह अपनों के जीवन में खुशियां भरती है
नारी त्याग और बलिदान की मूर्त है एक सफल पुरुष के लिए नारी की बहुत जरूरत है.
संवर ही जाती जिंदगी हमारी यदि होती हमारी अपनी नारी (4)
” संदीप काला”

Comments

10 responses to “हास्य कविता :-” यदि होती हमारी अपनी नारी””

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      Thanks

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      शुक्रिया जी

  1. Anand Swami

    Nice brother

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      धन्यवाद भाई साहब

  2. vinay swami

    Nice poem

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      आभार स्वामी जी

  3. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    धन्यवाद पंडित जी

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