ग़ज़ल

ग़ज़ल
: अनुपम त्रिपाठी

इक शख्स कभी शहर से ;
पहुँचा था गाँव में ।
अब रास्ते सब गाँव के ;
जाते हैं शहर को ।।

खेत–फ़सल–मौसम ;
खलिहान हैं उदास ।
ग़मगीन चुभे पनघट ;
हर सूनी नज़र को ।।

कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये;
घूंघट की ओट में ।
पायल से पूछें चूडियाँ ;
कब आयेंगे घर ” वो ” ।।

बेटा निढाल हो के ;
हर रोज पूंछे माँ से ।
क्यूं छोड़ गया बापू ?
इस गाँव को– घर को ।।

गाँवों में कम है : सुविधा;
पर अपनापन महकता ।
बेहतर है रुखी–सूखी;
ये अपनी गुज़र को ।।

सुनते हैं रहती गाँवों में;
भारत की आत्मा ।
शहरों में क्या है : जादू ?
लगे आग शहर को ।।

डंसती है रात बैरन ;
झुलसाए मदन तन–मन ।
कैसे बताऊं साजन ;
मैं ! पीती ज़हर जो ।।

हुक्के में डूबा ” बापू ” ;
अलाव बन गया ।
किसको दिखाऊं ” अनुपम”
इस चाक़— जिग़र को ।।
: अनुपम त्रिपाठी
**********——-*********
‪#‎anupamtripathi‬
‪#‎anupamtripathiG‬


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

6 Comments

  1. UE Vijay Sharma - February 19, 2016, 7:34 pm

    पायल से पूछें चूडियाँ ;
    कब आयेंगे घर ” वो ” …… subhan allah….

    • Anupam Tripathi - May 6, 2016, 4:56 pm

      आदरणीय विजयजी; कृषि के लाभ का सौदा न रहने और हस्तकौशल का मशीनीकरण की बलि चढ़ जाने से ; रोजगार की तलाश में गाँवों का जो पलायन शहरों की ओर हो रहा है——उसी टीस का बयान है—-यह रचना।प्रयास रहा है कि; अर्थोपार्जन हेतु मर्म को कितनी चोट पहुंचती है।कुछ व्यवस्थाओं की विसंगतियां—-कुछ विकास की विद्रुपता —-कुछ जीवन यापन की मज़बूरियां और अंतत: इन सबका खा़मियाजा भुगगता बचपन और उपेक्षित यौवन।दर्द की जु़बां होती तो वो अलहदा और क्या कहता ? आभार आपके प्रोत्साहन हेतु।

  2. Panna - February 20, 2016, 3:27 pm

    nice

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 11:13 pm

    बहुत सुंदर

  4. Abhishek kumar - November 25, 2019, 9:08 am

    सब कहीं दिखाई देते हो आप

Leave a Reply