गलियों को छोड़ हम
इन्कलेभ में आ गए।
छोटे छोटे घर आज
महलों में छा गए।।
दूर हो गए चाचे – ताए
पड़ोसियों में छाया मतभेद।
पाकर अकेलापन में बन्धु
विनयचंद के मन में खेद।।
अकेलापन
Comments
8 responses to “अकेलापन”
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बहुत सुंदर
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सुंदर
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समीक्षा हेतु हार्दिक आभार
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Nice
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Jay Ram jee ki
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यथार्थपरक लेखन
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Good
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समसामयिक तथा यथार्थ चित्रण
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