अकेलापन

गलियों को छोड़ हम
इन्कलेभ में आ गए।
छोटे छोटे घर आज
महलों में छा गए।।
दूर हो गए चाचे – ताए
पड़ोसियों में छाया मतभेद।
पाकर अकेलापन में बन्धु
विनयचंद के मन में खेद।।

Comments

8 responses to “अकेलापन”

  1. Amita

    बहुत सुंदर

    1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

      सुंदर

      1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

        समीक्षा हेतु हार्दिक आभार

  2. राकेश पाठक

    Nice

  3. vikash kumar

    Jay Ram jee ki

  4. Pragya

    यथार्थपरक लेखन

  5. समसामयिक तथा यथार्थ चित्रण

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