तुम्हें खोने का डर
एक अनजाने,अनचाहे
मुकाम तक पहुंचाएगा
खुद को वही रोक लेती
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना ।
नीचे गिर कर संभलना
सीखा था हमने
खुद की नजरों से गिरकर
न आया संवरना
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना ।
तमाम अकुलाहटे झकझोरती
खुद से तर्क-वितर्क कर निचोड़ती
आपसी द्वेष को करें दरकिनार
द्वैत का भाव फिर से है तैयार
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना ।
अगर मालूम होता
Comments
4 responses to “अगर मालूम होता”
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Very good👍
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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सादर आभार
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