अचरज भरा आकाश

अचरज भरा आकाश है
कहीं धूप है कहीं छांव है
आसमान की चादर में
सितारों के बूटे हैं
बादलों के घोड़े हैं
जो दौड़ते हैं इधर-उधर
जुगनू भी अपनी प्रेयसी को
ढूंढते हैं रात भर
चाँदनी है छितरी हुई
सबकी छतों पर इस तरह
रजत पिघलाकर किसी ने
फैला दिया हो जैसे हर जगह…

Comments

5 responses to “अचरज भरा आकाश”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

  2. Satish Pandey

    चाँदनी है छितरी हुई
    सबकी छतों पर इस तरह
    रजत पिघलाकर किसी ने
    फैला दिया हो जैसे हर जगह”
    वाह वाह, बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति प्रज्ञा जी।

  3. Geeta kumari

    प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा वर्णन, बहुत ही खूबसूरती से बयां किया है।
    वाह, अति सुंदर प्रस्तुति ।

  4. बहुत ही सुन्दर

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