आज धरा से मिला आकाश ,तो अच्छा लगा।
नन्हीं – नन्हीं बूंदों से हरी हो गई घास ,तो अच्छा लगा।
तल्ख़ हो जाए ,कुछ बातों से जब दिल,
कोई दे जाए बातों की मिठास , तो अच्छा लगा।
यूं ही तो कोई किसी की परवाह नहीं करता,
कोई दिलाए “ख़ास” का एहसास, तो अच्छा लगा ।
अच्छा लगा
Comments
20 responses to “अच्छा लगा”
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बेहतरीन
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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आपकी कविता में साहित्यिक स्तरता का चरम बिंदु है। संतुलित पंक्तियाँ, सुरम्य काव्य, इस प्रतिभा को सैल्यूट
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इस सुन्दर समीक्षा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी 🙏 आपका स्नेह और प्रेरणा मिलती रहे। बहुत बहुत आभार।
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आपकी कविताएं वास्तव में बेहतरीन हैं
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🙏🙏
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सुन्दर प्रस्तुति
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धन्यवाद जी 🙏
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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धन्यवाद सुमन जी 🙏
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, अतिसुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏
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✍🙏🙏💐
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🙂🙏🙏
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लाजवाब कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद जी 🙏
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बेहतरीन
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बहुत बहुत धन्यवाद पीयूष जी 🙏
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Nice poem geeta ji
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Thank you very much for your lovely complement chandra mam🙏
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