अनकही सी एक बात

बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या,

कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है
और खरीद लूँ वो खिलौने
जिसमें लाखों कि खुशी रहती है
खरीदना है मुझे आँचल वो माँ का
जिसके पहलू में कभी धूप नही लगती
कहाँ पाऊँ मैं जिगर बाप का
जिसके साये में कभी भूख न बिलखती
ऐसी कश्ती से मेरा सामना हर बार हो गया है
कितनी तेजी से ये शहर भी बाज़ार हो गया है

Comments

9 responses to “अनकही सी एक बात”

  1. Panna Avatar
    Panna

    अद्भुत काव्य रचना|

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Tnx 🙂

  2. Ajay Nawal Avatar
    Ajay Nawal

    Nice poem

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Thanks bhai

  3. Anjali Gupta Avatar
    Anjali Gupta

    beautiful poem 🙂

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Tnx 🙂

  4. Kapil Singh Avatar
    Kapil Singh

    इक अनकहे सच को बयां करती है आपकी कवित.. लाजबाव

    1. Vikas Bhanti Avatar
      Vikas Bhanti

      Thanks Kapil Bhai…

  5. Satish Pandey

    कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
    खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
    वाह वाह

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