खो गये सारे शब्द
अब जाने कहाँ !
जज्बात भी चादर
ओढ़ सो गये
कल्पना भी अब
कहीं विचरण नहीं करती
सपने सारे सपने हो गये
मेरे अन्दर की
कवयित्री अन्तस के आरेख’
बन गई
धुरी कविताओं की अधूरी रह गई!!
“अन्तस के आऱेख”
Comments
6 responses to ““अन्तस के आऱेख””
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Good
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Thanks
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बहुत ख़ूब
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धन्यवाद
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अतिसुंदर
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Thanks
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