अपना गणतंत्र

अपनी तमाम विषमताओं के साथ
अनगिनत विविधताओं के बावजूद
सबसे माकूल व्यवस्था है ‌अपना गणतंत्र।
इस बदलते समय की बस यह मांग है
लोक के प्रति तंत्र की सहिष्णुता
और तंत्र के प्रति लोक की समझदारी
लोक से परे लोक का उल्लघंन
तंत्र की नाकामी की‌ ओर बढ़ता कदम
कैसे कहें माकूल व्यवस्था है अपना गणतंत्र।
अपनी है चुनौतियां, जो अपनों के द्वारा दी गई
पङोसी बेख़ौफ़ देख हमें दम्भ से मुस्करा रहा
अपने इस संघर्ष से हौसले दुश्मनों के बुलन्द
ऐसे में, कैसे कहें माकूल व्यवस्था है ‌अपना गणतंत्र‌।
समय के साथ, करते कमी अब भी दूर क्यूं नहीं
दूर होता जा रहा, फिसलता जन गण का विश्वास
बिखरता आत्मसम्मान आसक्त होता यह शासन
फिर बता कैसे कहें, माकूल व्यवस्था है गणतंत्र ।

Comments

9 responses to “अपना गणतंत्र”

    1. सादर आभार

  1. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. सादर आभार

  2. सुन्दर रचना

    1. सादर धन्यवाद

    1. सादर धन्यवाद

  3. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    umdaa

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