अब तो चुनर भिगा लो

जाओ न इस तरह से
बरसात की ऋतु है,
रूठो न इस तरह से
बरसात की ऋतु है।
छोटी सी जिंदगी है
दूरी में मत बिताओ,
तन्हा रहो न ऐसे
बरसात की ऋतु है।
बाहर बरस रहे हैं,
सावन के मेघ रिमझिम
अपनी लगी बुझा लो
बरसात की ऋतु है।
कब तक रहोगे प्यासे
कब तक रहोगे सूखे
अब तो चुनर भिगा लो
बरसात की ऋतु है।
आओ ना पास आओ
ऐसे न दूर जाओ
श्रृंगार रस पिलाओ
बरसात की ऋतु है।
—— डॉ. सतीश पांडेय

Comments

5 responses to “अब तो चुनर भिगा लो”

  1. प्रकृति का सुंदर वर्णन।

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  2. Geeta kumari

    श्रृंगार रस से सजी सुंदर रचना

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