अरी सरिता

अरी सरिता,
न रुक
चलते ही बन
चलते ही बन।
राह में सौ तरह के
विघ्न हों,
उनको बहा ले जा,
पत्थरों को घिस
पीस दे सब नुकीलापन,
पकड़ ले मार्ग तू अपना
न ला मन में तनिक विचलन।
बना दे रेत पाहन की
किनारे श्वेत हो जायें
रोकना चाहते हों मार्ग जो
तुझमें ही खो जाएं।
स्वयं का मार्ग तूने ही
बनाना है,
समुन्दर तक पहुंचना है,
सतत प्रवाह रखना है।

Comments

4 responses to “अरी सरिता”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह वाह क्या बात है

  2. वाह कमाल है

  3. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    रुक जाना नहीं चलते जाना राह की हर मुश्किल को आसान बनाते हुए खूबसूरत अभिव्यक्ति

  4. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर भाव है

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