अश्क चमकीले ओस बने

मेरे अश्क जो गिरे धरा पर,
वो चमकीले ओस बने।
मुस्कुरा दिए वो दूर से देखकर,
मैं मोम सी पिघलती रही..
वो पाहन सम ठोस बने।
मेरी सिसकियों में उनको,
ठॅंडी पवन का एहसास हुआ
मेरे गर्म आंसू..
मेरी देह पिघलाते रहे॥
_______✍गीता

Comments

6 responses to “अश्क चमकीले ओस बने”

  1. बहुत सुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      हार्दिक धन्यवाद कमला जी

  2. अतिसुंदर भाव

    1. Geeta kumari

      सादर आभार भाई जी🙏

  3. लेखनी की प्रखरता को नमन

    1. बहुत आभार प्रज्ञा जी

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