तमाशा नहीं जिन्दगी
हकीकत है,
जी लो जी भर के
कल किसको फुर्सत है…
रोज़ लड़ते हो तुम
धन-दौलत के पीछे,
उतना ही कमाओ जितनी जरूरत है..
यह धन-दौलत सब यहीं धरा रह जायेगा,
जो कमाकर रखोगे वह
कोई और खायेगा..
जिस जमींन को खरीदकर
बनते हो तुम सेठ,
उस जमीन पर कल कोई और घर बनायेगा..
यहाँ जो कुछ भी है
सब नश्वर है,
ना किसी को मिल सका है कुछ
ना किसी का हो पाएगा…
जितना पोटली में है,
उतने में संतोष करो
जितना भाग्य में है उतना ही तो मिल पाएगा..
प्रेम से रहो और प्रेम ही करो,
अच्छा आचरण ही तो तुझे मोक्ष दिलाएगा…
सुन लो सभी आज कहती है प्रज्ञा !
यह संसार है यहाँ
जाने कब कौन आया है,
जाने कब कौन जाएगा !!
**आचरण की सभ्यता**
Comments
6 responses to “**आचरण की सभ्यता**”
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Tq
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सुंदर संदेश देती हुई बहुत सुंदर कविता, आचरण की सभ्यता की ज़रूरत सभी को है । बहुत सुंदर प्रस्तुति
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Ji thanks
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सुंदर
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Tq
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