कैसे दिन आये हैं!
नौकरी की बात करो तो
उज्जवला योजना गिनवाते हैं
बेरोजगारी का मुद्दा उठाओ तो आत्मनिर्भर का पाठ पढ़ाते हैं
इतना पढ़ लिख कर यदि
पकौड़े तलना था
तो आखिर हमने क्यों
दिन रात किताबों को सीने से लगाया
आत्म निर्भर ही बनना था तो
क्यों मां बाप ने पढ़ाया
हम भी तो अपने मां बाप का व्यवसाय चुन सकते थे
उनकी गरीबी में उनका हाथ बटा सकते थे
सोचा था मां बाप ने
बेटा पढ़ लिख कर बनेगा अफ़सर तभी तो तूने खूब पढ़ाया
खेतों में मेहनत कर कर कर
अब बैठा है घर में बेटा
परचून की दुकान लगाकर
बाप की छाती फटे और
बेटा बन गया आत्मनिर्भर।।
आत्मनिर्भर भारत(व्यंग्यात्मक काव्य शैली)

Comments
7 responses to “आत्मनिर्भर भारत(व्यंग्यात्मक काव्य शैली)”
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अति सुंदर
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धन्यवाद
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बहुत खूब
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धन्यवाद आपका
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व्यंगात्मक शैली में रचित यह रचना सरकारी नीतियों एवं योजनाओं पर कटाक्ष करती हुई।
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दिल से दिल्लगी न हो
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बहुत ही सुंदर
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