कविता-आपसे दूर हूं
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पापा मैं आपसे दूर हूं
आपके आशीष से भरपूर हूं,
कमबख्त काम ने घेरा है मुझे
ऐसा बंधक है बनाया
न गांव आ सकता
ना शहर छोड़ सकता,
गांव में जब आता हूं,
शरण स्नेह पाता हूं,
सरकार अब तुम दया करो,
मां बाप से बच्चों को न अलग करो,
शहर के जैसा गांव में भी,
अच्छी, सस्ती ,सुविधा ,युक्त,
यूनिवर्सिटी की व्यवस्था करो,
क्यों जाएं दूर शहर
प्रेम पर ना ढाओ का कहर,
मात-पिता संग रहने दो
उनकी आज्ञा में चलने दो
मम्मी पापा का छांव मिलेगा,
स्नेह संस्कार से हर बालक,
उच्च आदर्शों के संग आज्ञाकारी बनेगा,
ना कोई फिर
एसिड फेंके,
ना हत्या –
ना जुर्म करें,
बाल अपराध घट जाएगा,
जिस दिन से मम्मी पापा का –
पैर छूकर, बच्चा कॉलेज विश्वविद्यालय जाएगा
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कवि-ऋषि कुमार प्रभाकर
आपसे दूर हूं
Comments
4 responses to “आपसे दूर हूं”
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बहुत सुंदर
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धन्यवाद
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माता-पिता के बिछोह से व्यथित होकर एक युवक की दर्द भरी कहानी कहती हुई अति भावुक रचना
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जिस दिन आपने पिता पर रचना लिखी थी उसी दिन हमने इसे लिखा था
सुंदर समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
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