नि:स्वार्थ प्रेम

तुम धरा हो, मैं वृक्ष हूं
तुम चैतन्य हो, मैं प्रेम हूं |

तुम नदिया हो, मैं किनारा हूं
तुम अग्नि हो, मैं हवनकुंड हूं |

तुम जीव हो, मैं श्वास हूं
तुम मर्यादा हो, मैं छैला हूं |

सच कहूं मैं प्रिय तुम्हें तो
मैं हंस, तुम मेरी हंसिनी हो |

Comments

3 responses to “नि:स्वार्थ प्रेम”

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    नि:स्वार्थ प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति

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