मन के इतने खूबसूरत
आप कैसे हो गए,
आपको किसने सिखाया
इस तरह से स्नेह करना।
आप मे इतनी अधिक
ममता की बातें हैं भरी,
कि आप ऐसी लग रही हो
एक मिश्री की डली।
आपको पाने से आसूदाह हो
प्रसन्न हैं हम।
इत्तिका जब आप हो तो
ऐश से जीते हैं हम।
आप
Comments
7 responses to “आप”
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वाह वाह, बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ
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वाह वाह, पाण्डेय जी ऐसे ही बिंदास लिखते रहियेगा।
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बहुत ही शानदार कविता,बहुत ख़ूब
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बहुत-बहुत बधाई हो ।
अतिसुंदर -

बहुत खूब, wow, श्रेष्ठ सदस्य पदवी की बधाई सर
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अतिसुंदर भाव
सर्वश्रेष्ठ सदस्य के सम्मान हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ-
सादर धन्यवाद शास्त्री जी, आपका स्नेहिल आशिर्वाद है।
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