आहट

इतना भिगो मत मुझको
ओ बादल!
दल-दल बन न डुबो दूँ,
मुहब्बत।
खाली-खाली लगूँ
या हरी सी
हरियाली को बिछा दूँ।
चुप ही रहूँ या बता दूँ
मुझे है,
उनसे जरा सा चाहत।
या होने दूँ
उसकी कुछ आहट।

Comments

7 responses to “आहट”

  1. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.. लाजवाब अभिव्यक्ति

    1. बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

  2. pravin

    वाह कवि महोदय

    1. धन्यवाद प्रवीण जी

  3. Rohit

    Bahut sundar rachna

    1. धन्यवाद रोहित जी

  4. Amita

    सुंदर भावाभिव्यक्ति सर

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