मैं हक़ीक़त में आजादी का एहसास करने ही लगा था के बस।
फिर से मुझे ज़ंजीरों में जकड़ा जाने लगा।।
आ ही गया था के वो लम्हा ए इमकान (सम्भावना) खुशनसीब,
के बस यह एक ख़वाब है मेरा मुझे ये दिन रात जताया जाने लगा,
उठाकर हाथ में तिरंगा जब भी मैं अपने हाथ उठाने लगा,
सरहद पर मर मिटने वालों की सबको मैं याद दिलाने लगा,
धरती माँ के आँचल में है कितना सुकून ये हर हिन्दुस्तानी को मैं फिर बताने लगा,
आजादी की खातिर जो मिट गया शहीद वो हिन्दू और मुस्लिम के लाल रक्त की कहानी “एकता” का इंकलाबी नारे लगाने लगा॥
राही (अंजाना)

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