इंसान और हैवान

मै इंसानियत को खोजने चला हूँ, हैवानों के बाजार में।
कहाँ छुपा है इंसानियत, जरा देखें तो उसे क्या हाल है।।

Comments

9 responses to “इंसान और हैवान”

  1. बहुत ही लाजवाब और यथार्थ परक रचना

    1. Praduman Amit

      आपकी समीक्षा मेरी रचना हेतु सदा ही रहा है। बहुत बहुत धन्यवाद।

    1. Praduman Amit

      पंडित जी धन्यवाद।

  2. Amita Gupta

    बहुत सुंदर

    1. Praduman Amit

      शुक्रिया जी।

  3. Ekta Gupta

    बहुत खूब

    1. Praduman Amit

      हौसला अफ़जाइ के लिए धन्यवाद।

  4. vikash kumar

    Great

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